Friday, March 30, 2012

वो तलख मोहब्बत की गलियाँ, मुझको जाने क्यूँ रोके हैं

वो तलख मोहब्बत की गलियाँ, मुझको जाने क्यूँ रोके हैं,
फिर सख्त डाल वो अम्बिया की, जहां झूले वो क्यूँ टोके है ।

फूलों की तरह मैं बिखरा यहाँ जिस बाग़ का कोई माली नहीं,
मैं महका-महका फिरता यहाँ, खुशबू   उसकी क्यूँ रोके हैं  ।

गम में मेरा हमदर्द वो था ज़ुल्मत में भी था गमख्वार वही,
वो था भी कमाल-ए-इश्क मेरा, फिर गम जाने क्यूँ झोंके है ।

वो था भी फ़िदा मेरी जुल्फों पे जो अब तक वादा निभावे है,
तू फलक पे है या गर्दिश में आ जनम-जनम के मौके हैं ।

मेरे सबर का दामन उजड़ गया, फ़रियाद भी मेरी उजड़ गयी,
अब 'हर्षा' के अरमानों  में नया इक मौत का फतवा ठोके है ।


___________________________हर्ष महाजन