Thursday, March 29, 2012

कितना अदब था उसको जब हम बाग़ में जाया करते थे

कितना अदब था उसको जब हम बाग़ में जाया करते थे
सुबहो शाम ले हाथ में हाथ फिर छोले खाया करते थे ।

न थी परवाह कोई पैसों की न चाह ही बताया करते थे
जो होता अपने पास दोनों इक दूजे पर जाया करते थे ।

न थी कोई फिक्र महंगायी की जुल्फों पे न खर्चा करते थे
दिल फ़ेंक महोब्बत करते थे बे-बाक फिर चर्चा करते थे ।

हो जाती थी तकरार कभी पल-पल तडपाया करते थे,
इंतज़ार सुबहो की करते करते सब भूल जाया करते थे ।

अब देख जेब को डरते हैं अखबार को रोज़ ही पड़ते हैं
हर चीज़ के भाव बदलते ही, तेवर बीवी के बदलते हैं ।

अब डर है सावन आते आते उसका रुख अब क्या होगा,
वादा जो किया था कपड़ों का न होगा पूरा तो क्या होगा ।


_________________________हर्ष महाजन