Friday, April 13, 2012

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं

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ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

कली-कली हर ड़ाल  पर लिखा 'बोस' 'भगत',आज़ाद यहाँ,
माता गंगा, जमुना विचरित, अजूबा  विश्व का ताज यहाँ ।
भारत देश आज़ाद है जब से कोई दुश्मन यहाँ ठहरा नहीं,
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।
ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

कभी हुआ परिवेश राम का कभी कृष्ण अवतार हुआ
कभी हुआ महाभारत का जंग कभी कंस संहार हुआ ।
ऐसी रामायण, ग्रन्थ न गीता ऐसा कोई रंग गहरा नहीं ,
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

जम्मू और कश्मीर की खातिर कितनी कोखें उजड़ गयीं,
वीर भगत सिंह सुखदेव जैसे रोज़ जनम यहाँ लेते नहीं ।
ऐसा हिन्दू ,सिख न मुस्लिम ऐसा कोई रिश्ता गहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

________________हर्ष महाजन ।