Tuesday, May 1, 2012

कितना तलख तंज़ दिया उसने आज

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कितना तलख तंज़ दिया उसने आज
मेरी ग़ज़ल पर दंग किया उसने आज।

कब तक निकलेगी आँहे मेरे मिसरों पे
उसकी बहर को भंग किया उसने आज।

बदली है न बदलेगी उसकी आदत अब,
खुद को अकल-मंद किया उसने आज ।

दर्द मेरे शब्दों को भी होने लगा है अब,
उनको भी ना-पसंद किया उसने आज ।

क्यूँ छूने लगीं बुलंदी को ये ग़ज़लें 'हर्ष',
इस सवाल पर जंग किया उसने आज ।

_________हर्ष महाजन ।