Wednesday, May 2, 2012

दिन रात उसकी याद में पीता रहा हूँ मैं

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दिन रात उसकी याद में पीता रहा हूँ मैं
इक जाम राह-ए-चश्म मिले तो कुछ और बात है ।

फ़िराक-ए-यार में पिए हैं जाम-ए-अश्क बहुत
इक जाम मिले लबों से तो कुछ और बात है ।

कब तक छुपेगा ऐब वो रकीबों के संग रही
ये सब  कहे वो झूठ तो कुछ और बात है

मैकदे में बैठ ज़ख्म सी रहा हूँ मैं
ये ज़ख्म उम्र भर मिलें तो कुछ और बात है

न देख सकूंगा हमसफ़र किसी ओर को मैं 'हर्ष'
मुझको उठा ले खुद खुदा तो कुछ और बात है ।

____________हर्ष महाजन ।


फ़िराक-ए-यार=यार की जुदाई