Saturday, June 2, 2012

जब से बनी अखियाँ समंदर बता सकूं न छुपा सकूं

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जब से बनी अखियाँ समंदर बता सकूं न छुपा सकूं
फिर हो गया बे-वफ़ा मुक़द्दर बता सकूं न छुपा सकूं ।

कुछ इस तरह बिखरा 'हर्ष' सिमटा सकूं न उठा सकूं
फिर कभी यादों का चिलमन जला सकूं न बुझा सकूं ।

_______________हर्ष महाजन