Tuesday, June 12, 2012

कभी बेकसी में गुजरी कभी इम्तिहाँ से गुजरी

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कभी बेकसी में गुजरी कभी इम्तिहाँ से गुजरी
ये ज़िन्दगी की कश्ती जाने कहाँ-कहाँ से गुजरी  ।

कभी इश्क में जलाए कुछ चराग उन दिलों में
जहां ज़िन्दगी उम्मीदों के दरमियाँ से गुजरी  ।

कभी उनके साथ गुजरी बन के यादगार गुजरी
जो बगैर उनके गुजरी किस इम्तिहाँ से गुजरी ।

कहते हैं लोग दिल को शीशे सा है ये नाज़ुक
गर टूट जाए दिल फिर आवाज़ कहाँ से गुजरी ।

अब चला है 'हर्ष' लेकर सब्र-ओ-करार यूँ अब
ज्यूँ कूचे से उनके अर्थी फिर इस जहां से गुजरी ।


______________हर्ष महाजन ।



बेकसी=लाचारी, बेचारगी