Wednesday, September 12, 2012

अना वो रस्सी है इस जहां में, गर जल भी जाए, पर बल न जाए,

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अना वो रस्सी है इस जहां में, गर जल भी जाए, पर बल न जाए,
वफ़ा के बदले वफ़ा ही चाहे, पर इस वफ़ा में, भी छल न जाए |

मुमकिन नहीं उसे भूल पाऊं वो इश्क आफत-ए-जाँ अब बना है
नाज़-ओ-नखरे भी अब बहुत हैं पर कोई छलिया ही छल न जाए |

जब से यादों की मंजिलों पर अब उसने आना ही छोड़ दिया है
डर है कि उसकी ख्वाईश में अब महूरत जुदाई का टल न जाए |

ऐ गर्दिश-ए-दौरां क्या कहूँ मैं गली गली से शहर हुआ है
वफ़ा की अर्थी निकल चुकी है अब मेरी जाँ भी निकल न जाए |

फिराक-ए-यार ने अश्क दिए और हुस्न-ए-यारा ने दर्द दिया है
जो वक़्त गुज़रा है ख्वाब मानो जो अब बचा है फिसल न जाए |

___________________________हर्ष महाजन