Monday, October 1, 2012

हैं कहाँ-कहाँ शुमार ये गम आज देखते हैं

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हैं कहाँ-कहाँ शुमार ये गम आज देखते हैं,
दिल में कहाँ-कहाँ है ज़ख्म आज देखते हैं |
बिखरे से गेसुओं की महक भूला नहीं मगर,
कितने बचे हैं जुल्फों में ख़म आज देखते हैं |

मुर्दों सी ज़िंदगी को लिए घूमा किये हैं हम,
कैसे इसे जगाओगे तुम आज देखते हैं |

मुद्दत से पढ़ रहें हैं ग़ज़ल महफिलों में हम,
शायरी में बेकसी का गम आज देखते हैं |

जब से मिली हैं आँख वो दिल में उतर रहे हैं
कहाँ छुपी है अब ये शर्म आज देखते हैं |

कयामत में अब खुदा भी पूछेगा इक सवाल
कैसे रुकेगी अब ये कलम आज देखते हैं |

बे-वफ़ा नहीं थे मगर गफलत तो है कहीं 'हर्ष'
दिल में उठा था कितना भ्रम आज देखते हैं |

_______________हर्ष महाजन