Monday, October 8, 2012

हमने चाहा था ये इल्जाम न तेरे सर आये

...

हमने चाहा था ये इल्जाम न तेरे सर आये,
गुनाह जो हमने किया वो न तेरे पर आये |

कली जो बाग़ में भी फूल कभी न बन पायी,
हुआ ताज्जुब मुझे जो माली ले के घर आये | 

ग़मों के दौर में खुशियों से आँखें भर आयीं,
मगर ज़रूरी नहीं ये अश्क रो-रो कर आये |

मेरी तकदीर लिख खुदा भी जो पलट जाए,
खता थी क्या ज़मीं पे खुद खुदा उतर आये |

मरे जो हूर तो बने है ताजमहल उनका,
कफन मिले न आशिकों को गर उमर आये |


_________________हर्ष महाजन