Sunday, November 25, 2012

कुछ इस तरह गया कि मेरी ज़िंदगी लेता गया

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कुछ इस तरह गया कि मेरी ज़िंदगी लेता गया,
जिस चाँद की थी चांदनी वो चाँद ही लेता गया |
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उमंग भरे शेरों में था मेरी चाहतों का सिलसिला,
गजलों से मेरी शख्स वो फिर रौशनी लेता गया |

होंट से वो कह न पाया शर्म की लगता गाँठ थी,
क़त्ल कर अरमानों को, मेरी हसीं लेता गया |

यूँ ज़िंदगी सहरा हुई और आँखें भी दरिया हुईं,
शांत पड़ी लहरों से वो अब दुश्मनी लेता गया |

दोस्ती में दुश्मनी से 'हर्ष' तुझे हैरत है क्यूँ ?
ये रंजिश-ए-रकीब है जो ज़िंदगी लेता गया |

______________हर्ष महाजन