Friday, January 25, 2013

मुहब्बत में फ़रिश्ते भी किस काम आये

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मुहब्बत में फ़रिश्ते भी किस काम आये,
जब-जब मैखाने में हुस्न के जाम आये |

ज़ुल्फ़ कब तक गिरह में बंध कर रहेगी ,
जब तक गर्दिश-ए-दौरां उसके नाम आये |

मैखाने भी अपनी जगह अब बदलने लगे,
अब जहां-जहां हुस्न पर कोई इल्जाम आये |

नफस-नफस मुअत्तर होती है शुरूर-ए-ज़ुल्फ़ से,
मसरूफ-ए-ज़िन्दगी में कोई ऐसी शाम आये |

किस तरह निजात पाए इन जुल्फों से 'हर्ष',
हर कोशिश में अब हम वापिस नाकाम आये |

_____________हर्ष महाजन |

नफस-नफस = साँस-सांस
मुअत्तर = भीगा हुआ
शुरूर-ए-ज़ुल्फ़ =ज़ुल्फ़ का नशा