Tuesday, February 26, 2013

... ज़िंद में तेरी कभी ज़ख्म-ए-जिगर आऊँगा



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ज़िंद में तेरी  कभी ज़ख्म-ए-जिगर आऊँगा,
इश्क तुझसे हो मगर बनके फिकर आऊँगा |

जब कभी मेरी ग़ज़ल दिल से गुनगुनाओगे,
फूल बन जुल्फों में तेरी मैं नजर आऊँगा |

दाग जो तुमने जुदाई का कभी मुझको दिया,
अश्क मैं बन तेरी अखियों से उतर आऊँगा |

दिल में तस्वीर उसकी जब भी उतर आएगी,
खुद मैं बन के ग़ज़ल उस पे नजर आऊँगा |

जब तलक दिल में तेरे कोई चिंगारी न जले,
आँख से दिल का 'हर्ष' करके सफ़र आऊँगा |

_______________हर्ष महाजन