Tuesday, April 30, 2013

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9



काफिया ---------क्या होता है ?


अन्त्यानुप्रास अथवा तुक को  'काफिया' कहते हैं | क़ाफ़िया वह शब्द है जो प्रत्येक शे'र में .... ग़ज़ल की जान होता है, इसके पर्योग से शे'र में अत्यधिक लालित्य उत्पन्न हो जाती है और इसी उद्देश्य से शे'र मे काफिया रखा जाता है | दरअसल में जिस अक्षर या शब्‍द या मात्रा को आप तुक मिलाने के लिये रखते हैं वो होता है क़ाफिया । रदीफ़(इसे आगे बताया जाएगा ) के ठीक पहले आता है और सम तुकांत के साथ हर शे'र में बदलता रहता है। शे'र का आकर्षण क़ाफ़िये पर ही टिका होता है, क़ाफ़िये का जितनी सुंदरता से निर्वहन किया जायेगा शे'र उतना ही प्रभावशाली होगा। जैसे ग़ालिब की ग़ज़ल है..जरा गौर से देखिएगा .....

' दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्‍या है,
आखि़र इस दर्द की दवा क्‍या है '

अब यहां पर आप देखेंगें कि.... 'क्‍या है' .....स्थिर है और पूरी ग़ज़ल में स्थिर ही रहेगा |

वहीं दवा,
हुआ

जैसे शब्‍द परिवर्तन में आ रहे हैं । >>>>>>>>>>ये क़ाफिया है

'हमको उनसे वफ़ा की है उमीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्‍या है|

वफा क़ाफिया है |
ये हर शे'र में बदल जाना चाहिये । मगर ये कायदे से देखा जाए बहुत ज़रूरी भी नहीं है ...और ऐसा नहीं है कि एक बार लगाए गए क़ाफिये को फि़र से दोहरा नहीं सकते पर वैसा करने में हमारे शब्‍द कोश की ग़रीबी का पता चलता है और आने वाली ग़ज़लों पर भी लोगों को असर होता है...मगर करने वाले करते हैं..एक मैश'हूर ग़ज़ल देखिये.....
'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए
हम वफा कर के भी तन्‍हा रह गए,
ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मग़र
फ़ासले जो दरमियां थे रह गए'

अब देखिये इसमें रह क़ाफिया फि़र आया है क़ायदे में ऐसा नहीं होना चाहिये था हर शे'र में नया क़ाफि़या होना चाहिये ताकि दुनिया को पता चले कि आपका शब्‍दकोश कितना प्रभावशाली और समृद्ध है और ग़ज़ल में सुनने वाले बस ये ही तो प्रतीक्षा करते हैं कि अगले शे'र में क्‍या क़ाफिया आने वाला है ।

उदाहरण

किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है -(बाल स्वरूप राही)

उपरोक्त उदाहरण से हम 'रदीफ़' की भी पहचान कर सकते हैं इसलिए स्पष्ट है कि प्रस्तुत अश'आर में 'है' शब्द रदीफ़़ है तथा उसके पहले के शब्द

निकलता,
मलता,
दहलता
सम तुकान्त शब्द हैं तथा प्रत्येक शे'र में बदल रहे हैं इसलिए यह क़ाफ़िया है।
मुझे उम्मीद है इस छोटी सी परीभाषा आपका काफिया ज़रूर मज़बूत कर देगी |

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रदीफ़..........रदीफ़ क्या है ?


शे'र में काफिये के बाद आने वाले शब्द अथवा शब्दावली को 'रदीफ़' कहते हैं | दुसरे शब्दों में ये एक ऐसा समांत शब्द अथवा शब्द समूह है ....जो मतले के दोनों मिसरों के आखिर में आता है और अन्य अश'आर के मिसरा-ए-सानी अर्थात दूसरी पंक्ति के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है।..रदीफ़ का शाब्दिक अर्थ है --'पीछे चलने वाली' | काफिये के बाद रदीफ़ के पर्योग से शे'र का सौंदर्य और अधिक बढ़ जाता है | अन्यथा शे'र में रदीफ़ होना भी कोई अनिवार्य नहीं है | रदीफ़ रहित ग़ज़ल अथवा शे'रों को 'गैर मुरद्दफ़' कहते हैं | रदीफ़ में   मूल बात ये है कि ये हमेशा स्थिर रहता है ऊपर ग़ालिब के शे'र में देखिये ------
दवा क्‍या है,
हुआ क्‍या है
में क्‍या है स्थिर रहता है और....ये 'क्‍या है' पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहना है इसको रदीफ़ कहते हैं इसको आप चाह कर भी नहीं बदल सकते ।
अब हमारे सामने दो बाते आ गयीं

अर्थात
क़ाफिया वो...... जिसको हर शे'र में बदलना है |मगर उच्‍चारण समान होना चाहिये मतलब हम-आवाज़ होना चाहिए |

और रदीफ़ वो जिसको स्थिर ही रहना है कहीं बदलाव नहीं होना है ।

रदीफ़ क़ाफिये के बाद ही होता है ।

जैसे ''मुहब्‍बत की झूठी कहानी पे रोए,
बड़ी चोट खाई जवानी पे रोए'

यहां पर ' पे रोए' रदीफ़ है |

पूरी ग़ज़ल में ये ही चलना है कहानी और जवानी क़ाफिया है जिसका निर्वाहन पूरी ग़ज़ल में पे रोए के साथ होगा मेहरबानी (काफिया) पे रोए (रदीफ), जिंदगानी (काफिया) पे रोए (रदीफ) , आदि आदि । तो आज का सबक क़ाफिया हर शे'र में बदलेगा पर उसका उच्‍चारण वही रहेगा जो मतले में है और रदीफ़ पूरी ग़ज़ल में वैसा का वैसा ही चलेगा कोई बदलाव नहीं होगा

उदाहरण

आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
चाँदनी झांकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला - (शकेब जलाली)

ऊपर अश'आर में से 'निकला' शब्द रदीफ़ है। 

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A.कविता का स्वरुप
1.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11
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ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12