Saturday, May 4, 2013

ये चाहतों के सिलसिले हैं रोज़ बदलते क्यूँ

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ये चाहतों के सिलसिले हैं रोज़ बदलते क्यूँ,
फिर हुस्न के बाजार में ये ख्वाब पलते क्यूँ |

माना कि आज प्यार के काबिल नहीं जहां,
तो फिर यहाँ दीवानों के अरमां मचलते क्यूँ |

अब अस्मतें भी लुट रहीं और ख्वाब दर-बदर,
फिर जाहिलों से शहर में रकीब जलते क्यूँ |

बीमार दिल लिए हुए जो आशिकी में गुम,
फिर आशिकों के आजकल दिल दहलते क्यूँ |

ये बदनसीबी शहर की है फलक को छू रही,
ऐ ‘हर्ष’ बता इन ग़ज़लों में लफ्ज़ फिसलते क्यूँ |


________________हर्ष महाजन