Thursday, July 25, 2013

रात भर तेरे गम में चाक रहे, आँख भर-भर के जाम चलते रहे



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रात भर तेरे गम में चाक रहे, आँख भर-भर के जाम चलते रहे,
इक झलक पाने को मैखाने में, यूँ ही चढ़-चढ़ के दाम चलते रहे |

क्यूँ ये रातें हैं अब अंधेरों सी, चाँद छुप-छुप के क्यूँ निकलता है,
जिस तरह जल रहा वो परवाना, मेरे दिल से सलाम चलते रहे |

खौफ अब क्यूँ नजर नहीं आता, इश्क जब गैरों में मचलने लगे,
दर्द उठ-उठ सकूं यूँ देता रहा, जब तक उनके पयाम चलते रहे |

चाँद की चाहतों में दीवाना, उम्र भर भटके बादलों की तरह ,
इश्क महफूज़ मैयतों में सदा, जब वफाओं के जाम चलते रहे |

जब से उलझी हैं इश्क की राहें, तेरा नाम सजदे में पुकारा है,
और पतझड़ में गिरते पत्तों पर, तेरा लिख-लिख के नाम चलते रहे |

यूँ तो ये शहर बदनसीबों का, गम में भी करते शायरों से गिला,
है मगर ‘हर्ष’ बेरहम शायर , फिर भी उनके कलाम चलते रहे |

__________________________हर्ष महाजन