Monday, July 29, 2013

इस गुलिस्तान में खिलने को तो फूल बहुत हैं

कुछ पुराने अहसासों से .............

इस गुलिस्तान में खिलने को तो फूल बहुत हैं,
कोई फूल तुझ जैसा भी हो तो कोई बात बने |
बहुत खाएं हैं ज़ख्म ज़िंदगी ने अपनों से 'हर्ष'
इक ज़ख्म तुझ से हो जाए तो कोई बात बने |

______________हर्ष महाजन

17/09/2011