Monday, September 16, 2013

ग़ज़ल उठी जो दिल से फिर उन्ही पे ख़त्म हुई


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ग़ज़ल उठी जो दिल से फिर उन्ही पे ख़त्म हुई ,
मुसलसल मेरे बहे अश्क.......उनकी रस्म हुई |

खुदा भी जाने है अश्कों ......की जुबां होती कहाँ ,
ये पीड़ा गुज़री हद से पर.......कहे वो खत्म हुई |

प्यार किस्मत है, मेहरबाँ....सभी पे होता कहाँ,
 किसी को ज़िन्दगी मिली...किसी की भस्म हुई |

मैंने दिल से तो नज़्म....गीत ग़ज़ल बहुत कहे, 
मगर कसम दी ग़ज़ल गीत उन्ही की नज़्म हुई |

शराब पीता सुबह-ओ-शाम....... गम कैसे कटे,
   न जाने इंतकाम कैसा..........कहानी ख़त्म हुई | 

___________________हर्ष महाजन