Friday, November 15, 2013

मेरे अश्क़ों को वो रात भर पोंछ्ता रहा


मेरे अश्क़ों को वो रात भर पोंछ्ता रहा,
कैसा दुश्मन था सुबह तक सोचता रहा ।


कब्र में भी अभी तक क्यूँ चैन नहीं मुझे,
बेक़सूर था वो, गफलत में कोसता रहा ।

पत्थर बेजान होते हैं कितना गलत था मैं,
जाने के बाद भी , दिवारों में खोजता रहा ।

उसने तो बहुत खायीं थी कसमें वफ़ा की,
मेरी आखिरी सांस तक, वो बोलता रहा ।

रोज़ आता है मैय्यत पे मेरी फूल चढ़ाने,
कितना पाक था बेवज़ह मैं खोलता रहा ।

___________हर्ष महाजन