Thursday, December 12, 2013

इक अर्से बाद मुझे शायरी का लुत्फ़ आया है



इक अर्से बाद मुझे शायरी का लुत्फ़ आया है,
हर शेर में उसके शायरी का गुण समाया है ।

ऊला में काफिया और सानी में हम क़ाफ़िया,
बड़ी खूबसूरती से उस पर रदीफ़ सजाया है ।

बहुत तालाश थी मुझे इक ऐसे कलम कार की,
जिसके पास ये ज़हीन तिलिस्मी सरमाया है ।

कितने भी हों ज़ख्म और कितना भी उसमे दर्द,
शायरी का इक टुकड़ा ही उसकी दवा का फाया है ।

कितना मुश्किल था 'हर्ष' ग़ज़ल तक का ये सफ़र,
न जाने कितने रदीफ़, क़ाफ़ियों को आज़माया है ।

_______________हर्ष महाजन