Wednesday, May 7, 2014

देखकर शख्स हमें मुस्कराते रहे


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देखकर शख्स....... हमें मुस्कराते रहे,
दूर तक हमको....... वो याद आते रहे ।

हम भी थे अजनबी, अजनबी वो भी थे,
तनहा-तनहा सफ़र......हम निभाते रहे।

दूर तक थी दिलों में.. खलिश सी बहुत,
जब सफ़र टूटा.........आँखें मिलाते रहे ।

क्यूँ ऐसे अनजान ज़ख्मों में....दर्द बहुत,
सोचकर उम्र भर.........सर खुजाते रहे ।

तरंगे-दिल से तो हम उनके...परेशान थे,
फिर वो अक्स भी उनके.....सताते रहे ।

हम मिलेंगे शायद छोड़ा जिस मोड़ पर,
सहरो शाम वहां..........दीप जलाते रहे ।

हमसफ़र हमको अपने......अज़ीज़ बहुत,
पर वो शख्स दिल में घर को बनाते रहे ।

हमने जब जब ज़हन से, था पटका उन्हें,
रख वो ख्वाबों में..... जुल्फें सजाते रहे ।

जान 'पर' इश्क अनजान रहे हमसफ़र,
सोच ये अब 'हर्ष'.... अश्क बहाते रहे ।

पर=गैर

---------------हर्ष महाजन