Monday, November 3, 2014

वो शाम और वो जुल्फें, हमें खूब याद आयें

पुरानी डायरी से .........

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वो शाम और वो जुल्फें, हमें खूब याद आयें,
नींदों में है खलिश सी कह दो की बाज़ आयें |
मेरे लफ्ज़ और ग़ज़लें...तेरे हुस्न से हैं तारी,
कर लो श्रृंगार इतना......देने को ताज आयें |


_____________हर्ष महाजन