Friday, November 14, 2014

हर रोज़ शाम होती है.....सूरज रोज़ ढला करता है

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हर रोज़ शाम होती है.....सूरज रोज़ ढला करता है ,
मुहब्बत के समंदर में मुक़द्दर रोज़ जला करता है |
किस तरह खारिज करूँ रगों में दौड़ता ये ज़लज़ला,
हर ख्वाब अब उनका रातों में रोज़ छला करता है |

_____________हर्ष महाजन