Sunday, May 24, 2015

यूँ न उलझो मेरी जुल्फ से ओ सनम

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यूँ न उलझो मेरी जुल्फ से ओ सनम, पेच-ओ-ख़म फिर न इनके सुलझ पायेंगे,
गर न समझोगे फिर धडकनों की जुबां, दिल से दिल फिर कहाँ ये उलझ पायेंगे | 
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यूँ ही क़दमों पे धड़कन बिछाओ न तुम, कुछ शिकन माथे पर हैं हटाओ न तुम ,
अब बना हिन्दू, मुस्लिम ये सूरज जहां, वो कहाँ इन गुलों को समझ पायेंगे |


_______________________हर्ष महाजन