Monday, May 4, 2015

लम्हा-लम्हा मुझे ख़्वाबों में सताता है कोई

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लम्हा-लम्हा मुझे ख़्वाबों में सताता है कोई,
फिर मुझे रातों की नींदों से जगाता है कोई |
बेखबर है वो मुसाफिर शायद अश्कों से मेरे,
बस मुहब्बत की शमा रोज़ जलाता है कोई |


__________हर्ष महाजन