Wednesday, July 1, 2015

ग़लत-फ़हमियां थीं बढीं फासले बढ़ते रहे



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ग़लत-फ़हमियां थीं बढीं फासले बढ़ते रहे,
हम महोब्बत में थे वो दुश्मनी करते रहे |

दिल से मजबूर हैं हम तबादला कैसे करें,
इंतिहा इतनी बढी फिर सितम ढलते रहे |


इश्क में दाग हुआ बे-वफ़ा इश्क जो हुआ,
मौत पहलू में लिए जलते ओ बुझते रहे | 


इश्क आंधी तब हुआ खार जुल्फों में सजा,
रात हम सोते रहे........ख्वाब गैर होते रहे |


था गुमाँ इतना हमें अपनी इस खामोशी पर,
पर समंदर जब हुए ये ज़ख्म सिसकते रहे |


_____________हर्ष महाजन