Saturday, March 31, 2012

मुझे वो परवाज़ न देना कि वापिस आ न सकूं

मुझे वो परवाज़ न देना कि वापिस आ न सकूं
मिसरों से यूँ जुदा न करना कि तुम्हे पा न सकूं ।
बहूत लिए हैं इंतकाम बे-रहम दुनिया ने मुझ से
बा-कायदा मतले में रखना कि तुम्हे भुला न सकूं ।

__________________हर्ष महाजन

मेरे दर पर आने वाले तेरी तदबीर बना दूं


मेरे दर पर आने वाले तेरी तदबीर  बना दूं
अलख जगे हो जिसमे ऐसी तस्बीर बना दूं ।

______________हर्ष महाजन

Friday, March 30, 2012

वो तलख मोहब्बत की गलियाँ, मुझको जाने क्यूँ रोके हैं

वो तलख मोहब्बत की गलियाँ, मुझको जाने क्यूँ रोके हैं,
फिर सख्त डाल वो अम्बिया की, जहां झूले वो क्यूँ टोके है ।

फूलों की तरह मैं बिखरा यहाँ जिस बाग़ का कोई माली नहीं,
मैं महका-महका फिरता यहाँ, खुशबू   उसकी क्यूँ रोके हैं  ।

गम में मेरा हमदर्द वो था ज़ुल्मत में भी था गमख्वार वही,
वो था भी कमाल-ए-इश्क मेरा, फिर गम जाने क्यूँ झोंके है ।

वो था भी फ़िदा मेरी जुल्फों पे जो अब तक वादा निभावे है,
तू फलक पे है या गर्दिश में आ जनम-जनम के मौके हैं ।

मेरे सबर का दामन उजड़ गया, फ़रियाद भी मेरी उजड़ गयी,
अब 'हर्षा' के अरमानों  में नया इक मौत का फतवा ठोके है ।


___________________________हर्ष महाजन

Thursday, March 29, 2012

कभी हक की रोशनी में कभी हक के फासलों में

कभी हक की रोशनी में कभी हक के फासलों में,
वो ज़िन्दगी में मेरी  जाने कहाँ-कहाँ से गुज़रा ।

कभी दिल की धडकनों में कभी अश्क के सफ़र में
वो हर भंवर में शामिल मैं जहां-जहां से गुज़रा । 

मुझे कुछ पता नहीं था,  ये इश्क क्या बला थी,
वो जिस गली से गुज़रा मैं वहाँ-वहाँ से गुज़रा ।

जब इश्क में था ये दिल, इक बे-रुखी से गुज़रा
दिल अश्क-बार लेकर  फिर इम्तिहाँ से गुज़रा ।

मैं खुद भी तो हैराँ हूँ , मैं किस डगर से गुज़रा,
मुझे इल्म ही नहीं, गम के कारवाँ से गुज़रा ।


________________हर्ष महाजन

ये किस तरह की रौनक तुम किस गली से गुज़रे

..

ये किस तरह की रौनक हम किस गली से गुज़रे
इक ज़िन्दगी थी गुजरी , फिर ज़िन्दगी से गुज़रे ।

______________________हर्ष महाजन

भांवो पे तुम्हारे क्या लिखूं

भांवो पे तुम्हारे क्या लिखूं
इकरार लिखूं तकरार लिखूं ।
शरारत जो देखूं अखियों में ,
अब प्यार लिखूं इनकार लिखूं ।

______हर्ष महाजन

कितना अदब था उसको जब हम बाग़ में जाया करते थे

कितना अदब था उसको जब हम बाग़ में जाया करते थे
सुबहो शाम ले हाथ में हाथ फिर छोले खाया करते थे ।

न थी परवाह कोई पैसों की न चाह ही बताया करते थे
जो होता अपने पास दोनों इक दूजे पर जाया करते थे ।

न थी कोई फिक्र महंगायी की जुल्फों पे न खर्चा करते थे
दिल फ़ेंक महोब्बत करते थे बे-बाक फिर चर्चा करते थे ।

हो जाती थी तकरार कभी पल-पल तडपाया करते थे,
इंतज़ार सुबहो की करते करते सब भूल जाया करते थे ।

अब देख जेब को डरते हैं अखबार को रोज़ ही पड़ते हैं
हर चीज़ के भाव बदलते ही, तेवर बीवी के बदलते हैं ।

अब डर है सावन आते आते उसका रुख अब क्या होगा,
वादा जो किया था कपड़ों का न होगा पूरा तो क्या होगा ।


_________________________हर्ष महाजन

चश्म-ए-तर हुए जाते हैं उनके,मेरी तनख्वाह देखकर

चश्म-ए-तर हुए जाते हैं उनके,मेरी तनख्वाह देखकर
कितना बेबस हूँ मैं, उसे इस तरह लापरवाह देखकर ।

____________________हर्ष महाजन

बुज़ुर्ग किया न भूलियो, चल लाठी संग साथ

हर्ष महाजंस सिक्स लायीनार्स
______________________________


बुज़ुर्ग किया न भूलियो, चल लाठी संग साथ 
दुःख में उनको झेलियों, फ़र्ज़ निभा दिन-रात ।
फ़र्ज़ निभा दिन-रात, श्रवण के भाँती लीजो  ,
क़र्ज़ दूध का जान, उन्हें कुछ कमी न दीजो ।
कहे 'हर्ष' समुझाए, अपने कु करदे सुपुर्द,
उसी डगर गुजरना,  जब होवेगा तु बुज़ुर्ग ।

___________________हर्ष महाजन ।

Wednesday, March 28, 2012

राह-ए-वफ़ा भटके तो किनारा नहीं मिलता

राह-ए-वफ़ा भटके तो किनारा नहीं मिलता ,
  गर फूल टूटे  डाल से दुबारा नहीं खिलता ।

___________हर्ष महाजन

मेरी किस्मत शायद पाश-पाश होने को है तैयार

मेरी किस्मत शायद पाश-पाश होने को है तैयार,
ये महेंगायी का दौर तो मेरे घर में भी है बर-करार ।

किस तरह मनाऊंगा अपनी बीवी को ऐसे दौर में
जब दी थी फेहरिस्त और  कहा जाते हुए भोर में ।

सूट ले लेना साडी ले लेना,सैंडल ले लेना मेरे दिलदार
पाउडर करीम भूल न जाना इतर भी लेना खुशबूदार ।

राशन-वाषण भूल गया मैं हुक्म था उसका सर पे सवार
इक-इक शौपिंग कर डाली हुए होश फाख्ता देख बिल का सार ।

किया भुगतान तो देखा हमने कुछ और रकम की थी दरकार
रही सही इज्जत की उड़ गयी दज्जियाँ देखो अबकी बार ।

जिस चीज़ को देखो ऊंचे दाम हर चीज़ मुझ पे गुर्रायी
अबके मैंने सह लिया बस  अब और न सहेगी महंगायी ।

यूँ देख के मेरी घबराहट को बीवी कुछ-कुछ घबरायी
देख के खाली राशन का थैला  इतर को देख के शर्मायी ।

फिर प्यार से दे के चुम्बन कहा महंगाई सजन तुम भूल जाओ
मेरी फेहरिस्त नहीं चलेगी तुम अपनी फहरिस्त पर जाओ ।


________________________हर्ष महाजन

महंगायी-एक हास्य कविता

हे प्रिये ! आज मुझे किस तरह बहला रहे हो ,
बर्गर पीजा की जगह दाल-रोटी खिला रहे हो ।
प्रेम का रंग किस तरह से चढ़ा आज तुम पर
मुझे कार की जगह स्कूटर पर लिए जा रहे हो ।
उदास हूँ बहुत दिनों से कंगन लेने की आस थी,
मुझे लगता है इसी लिए सब कुछ बचा रहे हो ।

ये कैसी विडंबना है आज मेरी ऐ अहसास ए ज़िगर,
क़र्ज़ में डूबा, बर्गर पीज़ा का उधार चूका रहा हूँ मैं।
वो कार, जिसमे तुम बैठा करती थी, बिक चुकी है,
आजकल उसी से पेट्रोल, स्कूटर में, डलवा रहा हूँ मैं ।
चिंता न करें मेरी जान, आलू-चाट बेचता हूँ आजकल
तेरे कंगन के लिए आजकल पैसे बचा रहा हूँ मैं ।


______________हर्ष महाजन


किस तरह कमर-तोड़ महंगायी से जूझ रहा हूँ मैं

..

किस तरह कमर-तोड़ महंगायी से जूझ रहा हूँ मैं
वो क्या जाने ये सवाल किस तरह बूझ रहा हूँ मैं ।

कितना बेबस हूँ सब्जियों के दाम पूछ रहा हूँ मैं,
पेट्रोल और श्रृंगार से हमेशां कनफ्यूस रहा हूँ  मैं ।

कितना बेवक़ूफ़ हूँ यूँ ही कर्जों में डूब रहा हूँ मैं,
ये जानते हुए, सच्चायी से ही महफूज़ रहा हूँ मैं।


______________________हर्ष महाजन

वो शख्स मुझे शिकस्त देने की फ़िराक में रहता है

..

वो शख्स मुझे शिकस्त देने की फ़िराक में रहता है
हर बार होता है ध्वस्त,  फिर भी ताक में रहता है।

इल्म नहीं है उसे अपने इल्म के दर्जे का अभी 'हर्ष'
फिर भी वो बे-वज़ह अपनी खोखली धाक में रहता है।


___________________हर्ष महाजन  

ख्वाहिश-मंदों की तस्वीरें खींच रहा हूँ मैं

ख्वाहिश-मंदों की तस्वीरें खींच रहा हूँ मैं
याद करूंगा आप लोगों के बीच रहा हूँ मैं ।

आईने में देखता हूँ चेहरे की सिलवटें रोज़,
ढलती उम्र अब पल-पल सींच रहा हूँ मैं ।

उसके हुस्न की रानाई कब तक संभालूँगा,
इश्क तो है जिसे अब तक खींच रहा हूँ मैं ।

दावा नहीं करता उसे फिर से पा लेने का,
उसकी दी कसमे अभी तक पीच रहा हूँ मैं ।

उम्र का तो कुछ नहीं मालूम कहाँ तक है
पर लगता है आँखे पल-पल मीच रहा हूँ मैं ।

________________हर्ष महाजन
 

उनके हुनर पर वो अक्सर फब्तियां कसने लगे हैं

उनके हुनर पर वो अक्सर फब्तियां कसने लगे हैं,
आस्तीन में जो सांप थे वो बे-वजह डंसने लगे हैं ।

क्यूँ सजायी है ये बज़्म कि कला भी दम तोड़ने लगे,
जुर्म करने वाले मज़े में और बे-कसूर फंसने लगे हैं।

ज़ुल्म-ओ-सितम तो देखो किस तरह बरपा रहा यहाँ ,
दिन-दहाड़े अस्मतें लुटता देख शाहरिये हंसने लगे हैं ।

अब क्यूँ कोई ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ को बुलंद करे,
वो रक्षक बे-सबब इमानदारों पर शिकंजा कसने लगे हैं ।

क्या कोई समझ पायेगा इस दहशतजदा ज़िन्दगी को ,
वो दहशतगर्द यहाँ इक-इक कर फिर से बसने लगे हैं ।


__________________________हर्ष महाजन

Tuesday, March 27, 2012

अपने घर को छोड़ के, चली पराये गाँव

..

अपने घर को छोड़ के, चली पराये गाँव
काट दियो उसि डाल को,डाल तले जिस छाँव।
डाल तले जिस छाँव, सजन संग दूजे लागी,
वो नार बनी भुजंग, देख पर नार वो जागी ।
कहे 'हर्ष' समुझाए , न संजोयें ऐसे सपने,
पल में झटके जाएँ, रहें जु कभी थे अपने ।

__________________हर्ष महाजन

पतनी अपनी जात की, एकहू तरकश बाण

पतनी अपनी जात की, एकहू तरकश बाण
मियाँ जी के अगल-बगल, तनी जु तीर-कमान ।
तनी जु तीर-कमान, यु सौतन कैसे आवे
पति होए बेइमान, तो घर कु सर पे उठावे ।
कहें 'हर्ष' कविराय , घरां की खाओ चटनी
सौतन की न सोच, जब हो घर में जु पतनी ।


____________________हर्ष महाजन

वो नहीं है मेरा मगर मैंने इकरार किया है

वो नहीं है मेरा मगर मैंने इकरार किया है
सच कहूं तो उसकी बगावत से प्यार किया है ।
बे-वफायी तो देखो उसकी रगों में दौड़ रही है
भूल इल्लत सारी बस हालत से प्यार किया है ।

_____________________हर्ष महाजन


(साथियो पहला शेर मेरा बहूत पुराना है..उसमे एक शेर आज और जोड़ दिया है .....शुक्रिया । )

Monday, March 26, 2012

जुल्मी दरिंदा है फकत उस पर आँख रखना

जुल्मी दरिंदा है फकत उस पर आँख रखना
बहुत दिल फरेब है जरा अहतियात रखना  ।

______________हर्ष महाजन