Thursday, May 2, 2013

मुझे शक तो था कि वो दिलों से खेला करती है

...

मुझे शक तो था कि वो दिलों से खेला करती है,
मालूम न था इश्क में भी पतझड़ हुआ करती है |

_____________________हर्ष महाजन

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12

दोस्तों कत्ता, मुक्तक और रुबाई  किसे कहते हैं ?...

एक बार फिर से नजर डाल ली जाए

इस बारे मे यहाँ थोडा ब्यान करना चाहता हूँ.....इसके साथ रुबाई को जोड़े लेते हैं ...ये सब क्या हैं ? इसके बारे में भी भ्रम बहुत जियादा हुआ जाता है....हमारे नेट पर भी इस तरह के कई मंच हैं जहां इस नाम से बहुत कुछ पोस्ट हो रहा और जहां तक इसकी टेक्नेकलटी का सवाल है शायद फालो नहीं होती.....हर चार लाईन को कत्ता या मुक्तक माल लिया जाता है....लेकिन ऐसा है नहीं .....उर्दू मे कत्ता और हिंदी मे मुक्तक कहलाने वाला चार मिसरों का ये बण्डल बहुत ही पेचीदा है.....

पहले तो हम कत्ता और रुबाई को इसकी परीभाषा से ही अलग किये देते हैं...जिसे लोग आसानी से किसी को भी रुबाई कहने लगते हैं और किसी भी भी मुक्तक या कत्ता कहने लगते हैं.....

कत्ता और रुबाई मे अंतर .........

कत्ता:मुक्तक

इसमें पूरा शे'र होता है ( मतला + शे'र ) जो ज़यादातर एक ही ज़मीन पर होते हैं | जब एक शे'र में पूरा ख्याल जाहिर नहीं होता या न हो पाए तो शायर उस अहसास को दुसरे शे'र में पूरा(conclude) करता है |

____________________जैसे शरद तैलंग के ये कत्ते

ये फ़नकार सबसे जुदा बोलता है
ख़री बात लेकिन सदा बोलता है,
विचरता है ये कल्पनाओं के नभ में,
मग़र इसके मुँह से ख़ुदा बोलता है ।
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बात दलदल की करे जो वो कमल क्या समझे ?
प्यार जिसने न किया ताजमहल क्या समझे ?
यूं तो जीने को सभी जीते हैं इस दुनिया में,
दर्द जिसने न सहा हो वो ग़ज़ल क्या समझे ?
_____________________
मन्ज़िलों से देखिए हम दूर होते जा रहे है
हम भटकने के लिए मज़बूर होते जा रहे है
काम जब अच्छे किए तो कुछ तबज्जों न मिली,
जब हुए बदनाम तो मशहूर होते जा रहे है ।

शरद तैलंग

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रुबाई:


जबकि रुबाई में मिसरे तो चार होते हैं पर वो दो शे'र नहीं होते चार मिसरे ही होते हैं और उनकी लय (rhyming)भी कत्ते की तरह ही होती है |रुबाई में एक ही ज़मीन और ख्याल होता है जो पहले तीन मिसरों मे develop होता है और चौथे मिसरे में conclude होता है |
दुसरे शब्दों में ...
रुबाई में चार पंक्तियाँ होती हैं, जिनकी प्रथम दो पंक्तियों और चौथी पंक्ति के तुकांत मिलने चाहिए ।
यदि तीसरी पंक्ति का भी तुकांत मिलता है तो कोई त्रुटि नहीं मानी जाती है ।
रुबाई के लिए चौबीस बहर ( वज़्न ) निश्चित किये गए हैं ।

अगर आपने हरिवंश् राय बच्हन जी की मधुशाला पढ़ी हो...तो आसान हो जाएगा...

उनकी ये मधुशाला ....सारी रुबाई में ही कही गयी है....

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

साभार

हर्ष महाजन
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A.कविता का स्वरुप
1.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
शिल्प-ज्ञान -1 a
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
9.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9
10.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
11.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11
 

वो हर बार सीढ़ियाँ चढ़ती है उतर जाती है

...

वो हर बार सीढ़ियाँ चढ़ती है उतर जाती है
इश्क में वो बार-बार इस तरह सताती है |

______________हर्ष महाजन

साँसों पे इतना गरूर न करो 'हर्ष' के बे-वफायी पे उतर आयें

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साँसों पे इतना गरूर न करो 'हर्ष' के बे-वफायी पे उतर आयें
इश्क जब रुलाने पे आता है तो अपनी हद्द से गुजर जाता है ।

_______________________________हर्ष महाजन

Wednesday, May 1, 2013

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11

शेर बनता कैसे है....रुक्न की भाषा


दोस्तों नयी सुबह का सलाम.....शुभ-प्रभात ----

एक शिक्षक के रूप मे काम  करने से मुश्किल शायद कोई काम नहीं है ...आज
लोगों की प्रतिक्रिया के रूप में केवल दो ही प्रतिक्रियाएं आयीं पिछली कक्षाओं मे जो किया ..और जो अपना सुखन बनाये रखे हैं उनके लिए ये ज़रूरी है
कि अब तक की क्लास का ओउचित्य रहे उन्हें आज की क्लास जरूरी है यहाँ कुछ साथ जैम नहीं रहा....मेरी और भी क्लासेस चल रही हैं...वहाँ और यहाँ कितना अंतर है मैं देख रहा हूँ ...आज उनके किये हुए कई सवाल आज यहाँ आपको दूंगा....जिनके जवाद भी दिए हैं हैं.....आज का आखिरी दिन आपके साथ एक शिक्षक के रूप मे | पता नहीं ..नैनी जी से सम्भोदित कर रहा हूँ कि जाने क्यूँ इसी मंच पर ऐसा क्यूँ है....मुश्किल काम और एक रेयर नोलेज कोई क्यूँ नहीं सीखना चाहेगा ? ताज्जुब है...। वेसे एक बात तो है | यहाँ ऐसे शायर हैं क्यूँ सीखना चाहेंगे...और वो भी इसलिये कि जब बिना व्याेकरण के ज्ञान के ही शायर माना जा रहा है तो फिर ज़रूरत ही क्यास व्याकरण को सीखने की ।

चलो छोडिये.....थोडा अच्छा नहीं लगा सो कह दिया.....मैं लेस्सन की और आता हूँ...अब ग़ज़ल को फिर देखते हैं...ग़ज़ल किस प्रकार अपना रूप लेती है ..ग़ज़ल कोई टाफी नहीं जो घोली .और पी गए...मैंने इतना कुछ कहा ऊपर अपने पुराने लेस्सन मे .लेकिन उन सब से आप अपने कहे गए अहसासों कि मरम्मत तो कर सकते हो...लेकिन ..उन्हें ग़ज़ल कहेंगे या नहीं....ये बहूत दूर की कौड़ी है अभी...ग़ज़ल तक जाने के लिए ये अभी नर्सरी क्लास के ही लेस्सन हैं | अभी फस्ट/सेकण्ड/थर्ड/..........एम् ए ..पी.एच.डी अभी दूर की बात है...|आइये अब थोडा अब आगे बढ़ें |

दरअसल जो भी हम कहते हैं या लिखते हैं ग़ज़ल के रूप में या कविता के रूप मे उसमें ग़ज़ल ध्वरनि का खेल है पूरी की पूरी ग़ज़ल का काम जो है वो एक वैज्ञानिक आधार पर चलता है । इसका मतलब ये है कि ग़ज़ल को ध्वननि पर रचा जाता है । उसकी आवाज़ को गुना जाता है हमारे/ आपके मुंह से निकलने वाले उच्चाभरण पर ही सारा सब कुछ मुनस्सर रहता है । हमने अपनी छोटी क्लास्सेस में छंदों का ज्ञान लिया था अगर हम उन हिंदी के छंदों की बात करें तो वहां पर मात्राओं का खेल है वहां पर उच्चाारणों का उतना महत्वि नहीं है जितना मात्राओं का है । पर ग़ज़ल तो केवल और केवल ध्व्नि पर ही चलती है । इसके बारे में बहुत से भ्रम पैदा किये हैं ...बड़े बड़े उर्दुदन इस रूप को उलझाने में लगे रहते हैं...बहुत बहस मुबैये के बाद निष्कर्ष वही ढाक के तीन पात....तो हाँ मैं कह रहा था ..ग़ज़ल केवल ध्वनि पर ही चलती है आपने क्याब उच्चाहरण किया उस पर ही सब मुनस्सर है कि मात्राएं क्या होंगी । सिर्फ गज़ल में ही ऐसा होता है कि हम मोहब्बत भी कहते हैं और हम मुहब्बत भी कहते हैं |हम दीवाना भी कहते हैं और कभी दिवाना भी कहते हैं । हम दीवार भी कहते हैं और कभी दिवार भी कहते हैं । ये जो कुछ भी हो रहा है ये केवल इसलिये हो रहा है क्योंोकि उच्चािरण की सुविधा के कारण ये है ।यहाँ हम ये कह सकते हैं कि ध्वेनि विज्ञान का एक अद्‌भुत उदाहरण है ग़ज़ल । यहाँ पर मात्राएँ आपके स्वडर से निर्धारित होती हैं । हालाँकि भारतीय हिन्दी छंद की हिसाब से यहां पर भी लघु और दीर्घ दो प्रकार की मात्राएं होती हैं पर यहां पर ये स्वेतंत्रता होती है कि आप दो लघु को मिलाकर अपनी सुविधा से उसे एक दीर्घ के रूप में ले सकते हैं ।..देखो कैसी विडम्बना है.....अब क्यूँ न ये बड़े बड़े शायर इसको मुश्किल सौदे की तरह पेश करें....कोई नया शायर इस दुनिया में आये कैसे...सब दलीले खारिज कर दी जाती हैं....हमें अपनी रचनाओं मे अहसास को मात्राओं पर कुर्बान नहीं करना है.....लेकिन उनका ध्यान आवश्य रखना है.......ये पूरी बात जो ऊपर ने कही इसको रिफरेंस के रूप में याद रखें आगे आने वाले समय में आपको बार-बार इसकी ज़रुरत होगी |
अब आज आपको ये भी बता दें कि शेर बनता कैसे है ? इस बात की और ध्यान दें....और ये रुक्न जो शेर मे होते हैं ये क्या होते हैं |
रुक्नं :- अगर हम अपने कहे अहसास को जो शे'र के रूप मे पेश करेंगे .......अगर तुम
साथ देते तो शे'र कहने की प्रेक्टिस भी इसमें शामिल थी...जो आपी चुप्पी कि वज़ह से या आपके प्रश्नों की कमी की वज़ह से ख़त्म हो गयी....तो दोस्तों चलो ये आपका धेर्य है के आप इतना ही चाहते हैं....आगे कहना चाहूँगा ...कि पूरे शेर को अगर हम एक माला मान लें उस माला में लगे हुए छोटे छोटे मोती रुक्न हैं इन रुक्नोंू से मिलकर ही शेर बनता है । अब रुक्न् पर आने से पहले हम ये जानने का प्रयास करें क‍ि रुक्नज़ पैदा कहां होता है । दरअस्लय में लघु या दीर्घ मात्राओं का एक निश्चित गुच्छां रुक्ने कहलाता है । जैसे एक पुराना गीत है

पास बैठो तबीयत बहल जायगी |
इनके अगर हम रुक्न बनाये....यानि कि अगर इनके मोती देखें....इसमें तीन जगह विश्राम आ रहा है.....

इनकी मात्राएँ देखें....
पास बै-----ठो तबी------यत बहल--- जायगी |
212---------212----------212--------212
आप अब इन्हें रुक-रुक कर के पढ़ें जहां पर मैंने डेश लगाऐं हैं वहां पर विश्राम देकर पढ़ें । आपको भी लगेगा कि हां ऐसा ही तो है विश्राम तो आ ही रहा है । ये जहां पर विश्राम आ रहा है वास्तेव में वहां पर एक रुक्नु पूरा हो रहा है ।

एक दूसरा मश'हूर गीत

मुहब्त्- की झूठी कहानी पे रोए

इसको भी अगर देखा जाए तो इसमें भी तीन जगह विश्राम आ रहा है |

मुहब्त्ब ----की झूठी----कहानी-----पे रोए ।
आप अब इन्हें भी रुक-रुक कर के पढ़ें जहां पर मैंने डेश लगाऐं हैं वेसा ही फील होगा..जैसे ऊपर हुआ है....

अब एक काम करें छोड़ दें "पास बैठो तबीयत बहल जायगी |"
या मुहब्त्ँ की झूठी कहानी पे रोए को

और ये देखें ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला ।

अब एक काम करें बार बार नीचे की पंक्तियों को पढ़ें बार बार..फिर देखें कैसा प्रतीत होता है ..इनकी ध्वनी दीजिये....जैसे कहा गया है ....

पास बै-----ठो तबी------यत बहल--- जायगी |
ललाला----ललाला----ललाला----ललाला ले सकते हैं ।

मुहब्त् ----की झूठी----कहानी-----पे रोए
ललाला----ललाला----ललाला----ललाला ले सकते हैं ।

इसको आप तब तक बार बार पढ़तें रहें जब तक आपको ये न लगने लगे कि अरे दोनों में तो ग़जब का साम्यत है । साम्यप ये है कि दोनों का वज्न एक ही है ...एक ही ले है एक ही स्वर है....सारे व्यंजन उस पर खरे उतर रहे हैं...इसलिए कहा जाता है....कुछ भी पोस्ट करने से पहले अपनी रचना को तोलना है.....हर अहसास...कविता या ग़ज़ल नहीं होता.....

वजन ?
वो क्या बला है ।

तो रुक्न से हमने क्या सीखा यह कुछ निश्चित मात्राओं का एक समूह है । और हमें ये मालूम होना चाहिए अब कि मात्राओं से मिलकर ही बनते हैं रुक्नओ और रुक्नोंं से मिलकर ही बनते हैं मिसरे और मिसरों से मिलकर ही बनते हैं शेर और शेरों से मिलकर बनती हैं ग़ज़ल । मतलब रुक्नो ग़ज़ल की सबसे छोटी इकाई मानी जा सकती है । ऊपर क्याि है ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला अब ये ललाला क्याा है ये मात्राओं का एक तय गुच्छाो है जिसमें 122 का क्रम है एक लघु फिर दो दीर्घ मात्राएं आ रहीं हैं ।
बहर :-
बहर क्या है....बड़े बड़े विद्वानों ने बहर को हऊआ बना कर रख दिया है....इसे आसान तरीके से भी पेश किया जा सकता है....क्यूँ इसे मुश्किल उर्दू के तरीके से पेश किया जाता है....ये अब सोचने की बात है....हर इंसान इसे अपने सहज भाव से पेश कर सकता है....जैसे ऊपर बताया ..ररुक्नों का एक गुच्छा जो पहले से ही निर्धारित किया हुआ है ..उसे उर्दुदानों ने बहर का नाम दे दिया है...उस बहर का कोई मतलब नहीं है..उसे बस एक नाम दे दिया गया...हमें वो नाम भी याद रखने की ज़रुरत नहीं है.....जब कोई ग़ज़लकार ग़ज़ल पेश करता है...वो गाता है...नाकि नाम बताता है .....तो आज हमने देखा "रुक्नो" का एक पूर्व निर्धारित गुच्छा ही बहर होता है । पूर्व निर्धारित का मतलब जो कि पहले से ही तय है और आप उसमें कुछ भी परिवर्तन अपनी ओर से नहीं कर सकते हैं ।
जैसे मैंने ऊपर दिया ......
ललाला-----ललाला----ललाला------ललाला ये पहले से ही तय है और इसमें रुक्नों का जो घटक बना 122-122-122-122 है ये एक तय रूप है पूरी की पूरी ग़ज़ल इसी रूप पर चलेगी आप किसी शे'र में इसे बदल नहीं सकते हैं ।इसके रुक्न अगर बदलेंगे...तो संगीत मयी ले समाप्त हो जायेगी.....यही संगीतकार अपने साज़ में उठाते हैं.....वो संगीत देने से पहले पूछते हैं कि कौन सी बहर है...या खुद देख लेते हैं ... ये जो तय वियास ही बहर कहलाता है । अगर आपने किसी शे'र में विन्यांस में फेर कर दिया तो आपका शेर बेबहर हो जाता है खारिज हो जाता है । अर्थात जान लें कि पूरी की पूरी ग़ज़ल उसी बहर पर चलेगी |

अब एक गाना आवर देखिये..एक पुराना गीत है..हालांकि वो ग़ज़ल नहीं है

देखें उसी गाने का अंतरा
उसी गाने का अन्तर जो ऊपर लिखा है ....

न सोचा, न समझा, न देखा, न भाला

122-122-122-122 । ये अन्तर भी उसी बहर में है ।

पूरा का पूरा गाना ही इसी बहर में है....

तो साथियों आज की क्लास के साथ मेरा वडा आपके साथ पूरा हुआ.....

आजके बाद हम आपसे आप ही की तरह मुलाक़ात करेंगे....

एक बात ध्यान रखियेगा....जो इंसान और जो कवि..बिना सीखे....लिखने कि कोशिश करता है वो पीछे रह जाता है....
एक दरख्वास्त है आप सब जो भी यहाँ पर पढ़ रहे हैं...मेरे पास इतना वक़्त नहीं होता क मैं सबके इंतेखाब चेक करू.....जैसे आपके पास वक़्त नहीं पढने का भी.....आप भी अपनी ज़िन्स्दगी मे मसरूफ हैं...मैं भी हूँ...अपनी और भी ध्यान देना होता है...मैं अपने हिसाब से रचनाओं को पढ़ लेता हूँ.....आप ये कतई न समझें की आपकी रचनाओं को इग्नोर किया गया है...बस वक़्त कि कमी समझिये या कुछ और......क्युकी एक रचना को पढने मे ही काफी वक़्त लगता है......ये आप बाखूबी समझ सकते हैं.....|


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A.कविता का स्वरुप

1.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
शिल्प-ज्ञान -1 a
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
9.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9
10.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
12.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12



Tuesday, April 30, 2013

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10

:मतला : मतला क्या है ?

 ग़ज़ल के प्रथम शे'र को मतला कहते हैं |जिसके दोनों मिसरों में काफिया होता है | यही दोनों मिसरों मे काफिया न हो तो प्रथम शे'र होने के बावजूद भी शे"र को मतला नहीं कहा जाएगा | ग़ज़ल का प्रथम शे'र अमूमन/समान्यता मतला ही होता है | एक ग़ज़ल में एक से अधिक मतले भी हो सकते हैं , 'हुस्ने-मतला' कहा जाता है |
अच्छे शाइर अपनी ग़ज़ल की शुरू'आत यहीं से करता है ग़ज़ल का मतला अर्ज़ है । क़ायदे में तो मतला एक ही होता है लेकिन बाज शाइर एक से ज्‍़यादा भी मतले रखते हैं । ग़ज़ल का पहला शे'र जो कुछ भी था उसकी ही तुक आगे के शे'रों के मिसरा सानी में मिलानी है ।

उदाहरण

बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी
गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी ॥ (मतला)

ख़ता किसी कि हो लेकिन खुली जो उनकी ज़बाँ
तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी ॥ (दूसरा शे'र) --- अकबर इलाहाबादी

काफिये ----

पहला मिसरा=यार
दूसरा मिसरा=बहार
चौथा मिसरा=वार 

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 मक्ता किसे कहते हैं ?

ग़ज़ल के अंतिम शे'र को मक्ता कहते हैं जिसमे शाईर अपना उपनाम सम्मिलित करता है | यदि ग़ज़ल के अंतिम शे'र में शाईर का उपनाम सम्मिलित न हो तो उसे भी सामान्य शे'र ही माना जाता है | उपनाम को उर्दू में 'तख़ल्लुस' कहते हैं |

जैसे हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया पर याद आता है,
वो हर एक बात पे कहना के यूं होता तो क्‍या होता |
अब ऊपर के शे'र में गालिब आ गया है इसका मतलब शाईर ने अपने नाम को उपयोग करके ये बताने का प्रयास किया है कि ये ग़ज़ल किसकी है ।


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सारांश


आज इस क्लास का यहाँ अंत हुआ है..उसका "सारांश" हम सबने अभी तक क्या सीखा तो हम यूँ कह सकते हैं |

@शे'र'- अगर हम यूँ कहें "दो पंक्तियों में कही गई पूरी की पूरी बात जहां पर दोनों पंक्तियों का वज्‍़न समान हो और दूसरी पंक्ति किसी पूर्व निर्धारित तुक के
साथ समाप्‍त हो."

@'मिसरा उला' -शे'र की पहली लाइन होती है
@'मिसरा सानी' -शे'र की दूसरी लाइन होती है
@मिसरा :-'मिसरा सानी' व 'मिसरा उला' का सयुंक्त शब्द
@गागर में सागर भरना मतलब शे'र कहना ।
@क़ाफिया':-वह अक्षर या शब्‍द या मात्रा को आप तुक मिलाने के लिये रखते हैं या "वो जिसको हर शे'र में बदलना है मगर उच्‍चारण समान होना चाहिये "
@रदीफ : एक शब्द जिसे पूरी ग़ज़ल मै स्थिर रहना है या वो जिसको स्थिर ही रहना है कहीं बदलाव नहीं होना है
@ रदीफ़ क़ाफिये के बाद ही होता है ।
*मतला :ग़ज़ल के पहले शे'र को कहते हैं वैसे तो मतला एक ही होगा किंतु यदि आगे का कोई शे'र भी ऐसा आ रहा है जिसमें दोनों मिसरों में काफिया है तो उसको हुस्‍ने मतला कहा जाता है
@मकता : वो शे'र जो ग़ज़ल का आखिरी शे'र होता है और अधिकांशत: उसमें शायर अपने नाम या तखल्‍लुस ( उपनाम) का उपयोग करता है । जो की जरूरी नहीं है

@प्रश्न :-
१) ग़ज़ल मै तुकांत शब्द जो है वो कुछ इस तरह से प्रयुक्त होता है
1-काफिया
२- काफिया

३- x
४- काफिया

५- x
६- काफिया

अगर इसमें कुछ अलग से है तो वो भी दर्शा सकते हैं .....ये छोटी सी सारांश की तालिका अगर आप खुद कहते तो समझते की आपने या हमने कुछ सीखा है |

सादर

हर्ष महाजन

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नोट :-


सभी तकनीकी शब्दावलियों पर महारत तभी हासिल होगी जब कई सारे शे'रों/ग़ज़लों को दिल से पढ़ा जाए उन पर तरजीह दी जाए.....कलम चलाना ज़रूरी नहीं है...अच्छी ग़ज़लों को समझ के पढ़ें...जो अब तक पढ़ा है या सीखा है वही ढूंढें ......वो नहीं जो ..अभी तक नहीं पढ़ा..|
लेकिन इंसानी फितरत वही ढूंढता है जो अभी तक नहीं मिल रहा....
यही असफलता कि कुंजी है...|
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A.कविता का स्वरुप
1.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
शिल्प-ज्ञान -1 a
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
9.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 911.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11
12.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 9



काफिया ---------क्या होता है ?


अन्त्यानुप्रास अथवा तुक को  'काफिया' कहते हैं | क़ाफ़िया वह शब्द है जो प्रत्येक शे'र में .... ग़ज़ल की जान होता है, इसके पर्योग से शे'र में अत्यधिक लालित्य उत्पन्न हो जाती है और इसी उद्देश्य से शे'र मे काफिया रखा जाता है | दरअसल में जिस अक्षर या शब्‍द या मात्रा को आप तुक मिलाने के लिये रखते हैं वो होता है क़ाफिया । रदीफ़(इसे आगे बताया जाएगा ) के ठीक पहले आता है और सम तुकांत के साथ हर शे'र में बदलता रहता है। शे'र का आकर्षण क़ाफ़िये पर ही टिका होता है, क़ाफ़िये का जितनी सुंदरता से निर्वहन किया जायेगा शे'र उतना ही प्रभावशाली होगा। जैसे ग़ालिब की ग़ज़ल है..जरा गौर से देखिएगा .....

' दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्‍या है,
आखि़र इस दर्द की दवा क्‍या है '

अब यहां पर आप देखेंगें कि.... 'क्‍या है' .....स्थिर है और पूरी ग़ज़ल में स्थिर ही रहेगा |

वहीं दवा,
हुआ

जैसे शब्‍द परिवर्तन में आ रहे हैं । >>>>>>>>>>ये क़ाफिया है

'हमको उनसे वफ़ा की है उमीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्‍या है|

वफा क़ाफिया है |
ये हर शे'र में बदल जाना चाहिये । मगर ये कायदे से देखा जाए बहुत ज़रूरी भी नहीं है ...और ऐसा नहीं है कि एक बार लगाए गए क़ाफिये को फि़र से दोहरा नहीं सकते पर वैसा करने में हमारे शब्‍द कोश की ग़रीबी का पता चलता है और आने वाली ग़ज़लों पर भी लोगों को असर होता है...मगर करने वाले करते हैं..एक मैश'हूर ग़ज़ल देखिये.....
'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए
हम वफा कर के भी तन्‍हा रह गए,
ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मग़र
फ़ासले जो दरमियां थे रह गए'

अब देखिये इसमें रह क़ाफिया फि़र आया है क़ायदे में ऐसा नहीं होना चाहिये था हर शे'र में नया क़ाफि़या होना चाहिये ताकि दुनिया को पता चले कि आपका शब्‍दकोश कितना प्रभावशाली और समृद्ध है और ग़ज़ल में सुनने वाले बस ये ही तो प्रतीक्षा करते हैं कि अगले शे'र में क्‍या क़ाफिया आने वाला है ।

उदाहरण

किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ हाथ मलता है
वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है -(बाल स्वरूप राही)

उपरोक्त उदाहरण से हम 'रदीफ़' की भी पहचान कर सकते हैं इसलिए स्पष्ट है कि प्रस्तुत अश'आर में 'है' शब्द रदीफ़़ है तथा उसके पहले के शब्द

निकलता,
मलता,
दहलता
सम तुकान्त शब्द हैं तथा प्रत्येक शे'र में बदल रहे हैं इसलिए यह क़ाफ़िया है।
मुझे उम्मीद है इस छोटी सी परीभाषा आपका काफिया ज़रूर मज़बूत कर देगी |

____________________

रदीफ़..........रदीफ़ क्या है ?


शे'र में काफिये के बाद आने वाले शब्द अथवा शब्दावली को 'रदीफ़' कहते हैं | दुसरे शब्दों में ये एक ऐसा समांत शब्द अथवा शब्द समूह है ....जो मतले के दोनों मिसरों के आखिर में आता है और अन्य अश'आर के मिसरा-ए-सानी अर्थात दूसरी पंक्ति के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है।..रदीफ़ का शाब्दिक अर्थ है --'पीछे चलने वाली' | काफिये के बाद रदीफ़ के पर्योग से शे'र का सौंदर्य और अधिक बढ़ जाता है | अन्यथा शे'र में रदीफ़ होना भी कोई अनिवार्य नहीं है | रदीफ़ रहित ग़ज़ल अथवा शे'रों को 'गैर मुरद्दफ़' कहते हैं | रदीफ़ में   मूल बात ये है कि ये हमेशा स्थिर रहता है ऊपर ग़ालिब के शे'र में देखिये ------
दवा क्‍या है,
हुआ क्‍या है
में क्‍या है स्थिर रहता है और....ये 'क्‍या है' पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहना है इसको रदीफ़ कहते हैं इसको आप चाह कर भी नहीं बदल सकते ।
अब हमारे सामने दो बाते आ गयीं

अर्थात
क़ाफिया वो...... जिसको हर शे'र में बदलना है |मगर उच्‍चारण समान होना चाहिये मतलब हम-आवाज़ होना चाहिए |

और रदीफ़ वो जिसको स्थिर ही रहना है कहीं बदलाव नहीं होना है ।

रदीफ़ क़ाफिये के बाद ही होता है ।

जैसे ''मुहब्‍बत की झूठी कहानी पे रोए,
बड़ी चोट खाई जवानी पे रोए'

यहां पर ' पे रोए' रदीफ़ है |

पूरी ग़ज़ल में ये ही चलना है कहानी और जवानी क़ाफिया है जिसका निर्वाहन पूरी ग़ज़ल में पे रोए के साथ होगा मेहरबानी (काफिया) पे रोए (रदीफ), जिंदगानी (काफिया) पे रोए (रदीफ) , आदि आदि । तो आज का सबक क़ाफिया हर शे'र में बदलेगा पर उसका उच्‍चारण वही रहेगा जो मतले में है और रदीफ़ पूरी ग़ज़ल में वैसा का वैसा ही चलेगा कोई बदलाव नहीं होगा

उदाहरण

आग के दरमियान से निकला
मैं भी किस इम्तिहान से निकला
चाँदनी झांकती है गलियों में
कोई साया मकान से निकला - (शकेब जलाली)

ऊपर अश'आर में से 'निकला' शब्द रदीफ़ है। 

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A.कविता का स्वरुप
1.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --१
1.a
शिल्प-ज्ञान -1 a
2.ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --2 ........नज़्म और ग़ज़ल
3.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --3
4.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --4 ----कविता का श्रृंगार
5.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --५ .....दोहा क्या है ?
6.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --6
7.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --7
8.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8
10.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 10
11.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 11
12.
ग़ज़ल शिल्प ज्ञान - 12

साहित्य की वीणा में अब कुछ बातें कर लें

...

साहित्य की वीणा में अब कुछ बातें कर लें,
आओ मिलकर छंद-मयी मुलाकातें कर लें |
डूब चलें ग़ज़लों के सरोवर में कुछ इस तरह,
कहने के अंदाज़ में इकट्ठी कुछ सौगातें कर लें |

________________हर्ष महाजन

Saturday, April 27, 2013

ग़ज़ल शिल्प ज्ञान --8

मिसरा :
दोस्तों कल भी शे'र के मुतल्लक बात करते हुए हमने इस शब्द के बारे मे बात की थी ....जितना मैं जानता हूँ मिसरे के बारे में ..उसी प्रकार आपके समक्ष मैं अपनी बात रखता हूँ.....मैं अपनी बात दोहराता हूँ ....

मिसरा :-----शे'र की प्रत्येक पंक्ति को मिस
रा कहते हैं, इस प्रकार एक शे'र में दो पंक्तियाँ अर्थात दो मिसरे होते हैं- मिसरा-ए-उला और मिसरा-ए-सानी।

मिसरा-ए-उला

शे'र की पहली पंक्ति को मिसरा -ए- उला कहते हैं। 'उला' का शब्दिक अर्थ है 'पहला'।
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मिसरा-ए-सानी

शे'र की दूसरी पंक्ति को मिसरा-ए-सानी कहते हैं। 'सानी' का शब्दिक अर्थ है 'दूसरा'।

दुष्यंत कुमार हिंदी का सबसे पहला ग़ज़ल कार था ..उसका एक ग़ज़ल का शे'र
उदाहरण के रूप मे लेते हैं ......

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ---(दुष्यंत कुमार)[1]

उपरोक्त शे'र में शे'रकी पहली पंक्ति (हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए) को 'मिसरा-ए-उला'

और दूसरी पंक्ति (इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए) को 'मिसरा-ए-सानी' कहा जाएगा।
दोस्तों शे'र कहना कोई आसान नहीं है....शे'र कहने से पहले उसके हर पहलू का समझना बहुत ज़रूरी है...जब हम शे'र कहते हैं तो---- उसकी दो लाइनें होती हैं ----शे'र की पहली लाइन जो कि एकदम स्‍वतंत्र होती है और जिसमें कोई भी तुक मिलाने की बाध्‍यता नहीं होती है और हम कोई भी अहसास लिए उसे कह सकते हैं । इस पहली लाइन को कहा जाता है मिसरा उला ।


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उसके बाद आती है दूसरी लाइन :-जो कि बहुत ही महत्‍वपूर्ण होती है |जिसमे हमें अपनी विद्या का सब कुछ अर्पण करने का हुनर दिखाना होता है.....इसके लिए हमें अपने शब्द/अहसास/कला/हुनर/और पहली लाईन से उभरे प्रश्नों को समेटते हुए अपनी बात के अंत को अंजाम देना होता है जिस से कोई भी पहली लाईन के मुतल्लक प्रश्न बाक़ी न रह जाए ..मिसरा सानी में सब कुछ समाकर हमें दिखाना है |
इसमें ही आपकी/हमारी/अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना होता है और यही वो लाईन होती है जो शायर को शायर बनाती है....उसे वाह-वाह तक ले जाती है...भाषा जितनी सरल होगी उतना ही लोगों के दिलों तक पहुंचेगी....मुश्किल लफ्ज़ ढूँढने वाले ...किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं |..अब हमें देखना है ..इसमें किस टेक्नीक का पर्योग करना होता है | देखिये ....
सबसे पहले --- इसमें तुक का मिलान किया जाता है | अर्थात पूरी की पूरी बात हमें इन्ही दो लाइनॉ में ही कह देनी हैं और | पहली लाइन में आपको आपनी बात को आधा कहना है ( मिसरा उला ) जैसे -- एक शे'र --"कैसा है अब शोर यहाँ पर दिखते हैं घबराए लोग " इसमें शाइर ने आधी बात कह दी है अब इस आधी को पूरी अगली पंक्ति में करना ज़रूरी है (मिसरा सानी) "ढूँढा करते प्यार यहाँ पर सदियों से ठुकराए लोग" । मतलब मिसरा सानी---- वो जिसमें आपको अपनी पहली पंक्ति की अधूरी बात को हर हालत में पूरा करना ही है । तभी ये ग़ज़ल का हिस्सा बन पायेगा |
दूसरी और देखिये गीत के साथ इसका अंतर -----इस से आपको गीत के बारे में भी मालूम होगा....गीत में क्‍या होता है ------जब आप गीत कहते हैं ----अगर आपका अहसास --एक छंद में कोई बात पूरी न कर पाय तो अगले छंद में ले सकते हैं पर यहां ग़ज़ल में जब शे'र कहने पर ऐसा नहीं होता ---- यहां तो पूरी बात को कहने के लिये दो ही लाइनें हैं हमें उसी में अपनी बात पूरी करनी होती है....इस बीच बहुत सी चीज़ें ( मुक्तक/रुबाई) हैं जो हम आपको बता सकते हैं...लेकिन वो सब बताने पर आप पज़ल होने की कगार पर पहुँच जायेंगे....| हमें अभी शे'रों में ही खेलना है अर्थात गागर में सागर भरना मतलब शे'र कहना ।
मिसरा सानी हमारे शे'रों के लिए एक महतवपूर्ण हिस्सा है ----मिसरा सानी का महत्‍व अधिक इसलिये है क्‍योंकि आपको यहां पर बात को पूरा करना है और साथ में तुक ( काफिया--जिसके बारे में हम आपको आगे आने वाले लेस्सन में बताएँगे ) भी मिलाना है । मतलब ये है कि एक पूर्व निर्धारित अंत के साथ बात को खत्‍म करना |(मतलब मिसरा सानी ।)
तो आज हमने जाना कि मिसरा क्या होता है ..शे'र किस तरह पूरा होता है ...और एक छोटा सा शब्द ..'मिसरा' --कितना बड़ा अर्थ लिए हुए है |

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अगला अध्याय हमारा काफिये के ऊपर होगा ....... काफिया,  जो ग़ज़ल की जान होता है
--उसके बिना ग़ज़ल  को ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता -----
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