Wednesday, May 13, 2015

ज़लज़ले जो आ रहे अब.....बात कुछ तो ज़रूर है



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ज़लज़ले जो आ रहे अब.....बात कुछ तो ज़रूर है,
पाप पर्वत हो चलें जब........खुदा का ये दस्तूर हैं |
कौन जाने इस ज़मीं से, नाम किस का हट गया,
ज़हर उगलें अब हवाएं.......वो भी अब मजबूर हैं |
___________________हर्ष महाजन

:एक क्षणिका:

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:एक क्षणिका:
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जिस पल
उसने
आँचल से
मुझे उतार दिया |
यूँ लगा !!
भर हुंकार
खुदा ने
वापिस पुकार लिया !!

~~०~~

____हर्ष महाजन




अतीत के पन्नो से ..........

Tuesday, May 12, 2015

इन्सान की फितरत क्या कहिये, मुर्दों में खज़ाना ढूंढ लिया

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इन्सान की फितरत क्या कहिये, मुर्दों में खज़ाना ढूँढ लिया,
कहाँ बेचें जिस्म के अंगों को, उसका भी ठिकाना ढूँढ लिया |

छोड़ें न मरगट में वो कफ़न, करते न हर तन को वो दफ़न ,
इंसान की कीमत कुछ भी नहीं, अपनों ने निशाना ढूँढ लिया |

नौकर हो  चाहे व्यापारी, चाहे हो बाबू सरकारी,
दौलत के भूखे-नंगों ने,  उनका भी निशाना ढूँढ लिया |

किश्तों में जब लोग बिकने लगे, अपनों के संग वो दिखने लगे,
अहसास मरे यूँ अपनों के,  उनको फुसलाना ढूँढ लिया |

जब पल-पल यूँ ही मरने लगे , ऐसे मंज़र जब चलनें लगे,
तो उम्र घटी शैतानों की , जब 'हर्ष' दीवाना ढूँढ लिया |


हर्ष महाजन

ज़ुल्फ़ सहलाते हुए बे-वफ़ा कहते रहे



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ज़ुल्फ़ सहलाते हुए...........बे-वफ़ा कहते रहे ,
दर्द-ए-गम इतना बढ़ा हम सितम सहते रहे |
होगी मजबूरी फकत.मुझको मगर दूर न थे,
इश्क तहरीरों में फिर...अश्क बन बहते रहे |

_______ हर्ष महाजन

Sunday, May 10, 2015

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ

आदाब !!!!
क्या कहूँ आज मदर्स डे है !!! सो सो नमन माँ को !! बड़े खुश नसीब हैं वो सभी शख्स जिन्हें उनका साथ नसीब है | न जाने क्यूँ ये दिन ,किस ने और क्यूँ बनाया | मेरे लिए तो ये दिन ज़ह्नीय दर्द लेकर उभर कर आता है | सच में माँ का कोई सानी नहीं | हर इस दिन को मेरा मन पता नहीं कितने भावों को जन्म देता है और न जाने कितने भाव कुकरमुत्तों की तरह इस ज़हन में दफ़न हो जाते हैं | कुछ भाव तो जुबां पर आकर वापिस अपने ख्वाब-गाह में पहुँच जाते हैं.....शायद वो मेरी कलम जब शांत होगी तो बाद में पटल पर आयें.......हे माँ ..मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं ...???


गीत 

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ ,
दे दे तू अब अवतार कभी,
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............

जो ज्योत जली थी तुझसे माँ,
दुनियावी भी लगे रिश्ता गया |
ये लाल तेरे सब भटके हैं........2
तू दिखा अपना माँ द्वार कभी ।......2
हो सके तो आ, सुलझा दे माँ
उलझे सब दिलों के जाल सभी |
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............ 


मन-मन जोड़े थे, तूने माँ,
वो प्यार की वर्षा अब कहाँ गई
हम पापी जुल्मी सब ही तो थे,
फिर भी सहे तूने खार सभी..........2
अब तरस गए तेरे दरस को माँ 

तू दिखा दे अक्स का हाल कभी
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............ 

माँ तेरी नाव ही थी अपनी ,
अपनी पतवार तो थी ही नहीं,
अब अश्क रहें, अखियन में सदा,
दामन में जो ले, गमख्वार नहीं ।.....2
जब से छोड़ा तूने द्वार यहाँ ,
हासिल का कोई रखवाल नहीं |
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ.......

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ,
दे दे तू अब अवतार कभी,
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी .....2
मुद्दत से तुझे देखा ............


___हर्ष महाजन


हैप्पी मदर्स डे

:( :( :(

Friday, May 8, 2015

ऐ खुदा मुझे तुम अपनी अदाओं में रखना

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ऐ खुदा मुझे तुम अपनी अदाओं में रखना,
थक चुका हूँ ज़िन्दगी से दुआओं में रखना |

___________हर्ष महाजन

Thursday, May 7, 2015

चुगली निकल ज़ुबान से, अदभुत खेल दिखाय





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चुगली
चुगली निकल ज़ुबान से, अदभुत खेल दिखाय,
रिश्तों में इंसान के, तुरत फेर पड़ जाय |
तुरत फेर पड़ जाए, करावे जंग दुतरफे,
सब भुजंग बन जांय , जु इक-इक जां को तरसे,
कहे 'हर्ष' दो पलट, चुगल-खोरों की गुगली,
इक-इक करके पकड़, झटक दो करे जु चुगली||
हर्ष महाजन



कुण्डलिया छंद
पुराणी कृति






Tuesday, May 5, 2015

क्यूँ उठा आज तुफां समंदर में

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क्यूँ उठा आज....तुफां समंदर में,
भंवर दिल में....मचल गया कोई |
जिनकी खातिर अभी मैं जिंदा हूँ,
पल में उनको....बदल गया कोई |

________हर्ष महाजन

Monday, May 4, 2015

अपने उन आंसुओं का तो कभी ज़िक्र कर लिया होता

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अपने उन आंसुओं का तो.....कभी ज़िक्र कर लिया होता,
मुहब्बत किस कदर रुसवा हुई इत्मिनान हो गया होता |


____________________हर्ष महाजन

लम्हा-लम्हा मुझे ख़्वाबों में सताता है कोई

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लम्हा-लम्हा मुझे ख़्वाबों में सताता है कोई,
फिर मुझे रातों की नींदों से जगाता है कोई |
बेखबर है वो मुसाफिर शायद अश्कों से मेरे,
बस मुहब्बत की शमा रोज़ जलाता है कोई |


__________हर्ष महाजन

Sunday, May 3, 2015

जिस किसी ने भी देखा है उनकी ज़फाओं का जलवा

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जिस किसी ने भी देखा है उनकी ज़फाओं का जलवा,
उनके ज़िक्र भर से पेशानी ऊपर का रुख कर लेती है |

____हर्ष महाजन

इक ऐंज दा यार मिन्नू चाही दा ई



पंजाबी गीत 

इक ऐंज दा यार मिन्नू चाही दा ई,
तेरे वांग दा यार मीनू चाही दा ई |
दिलदार वि होवे मेरी तरहां,
खुशगवार वि हॉवे तेरी तरहां
नीली अखियाँ वाला चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू.......
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तेरी राहां नु मैं तां ताक्दा रहां
तेरे घर मोहरे मैं तां टापदा रहां
तेरी अखियाँ दे डोरे मैं गिनदा रहां
तेरी जुल्फां च लट वाट पऊंदा रहां
मेरे हत्थां दा ई हार तेन्नु चाही दा ई
तेरे वांग दा यार मिन्नू चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू........
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लाल घघरी उड़-उड़ जांदी तेरी
ऐन्नु मोटे घुँघरू तू लवा ले नी
तेन्नु कसम वे मेरे प्यार दी सजनी
गौरे पैरां विच झांझरां पाले नी
तैन्नू मेरे नाल नाचना चाही दा ई |
तेरे वांग दा यार मिन्नू चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू.......
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घुल जा तूं मिसरी दी डलिए
गौरे रंग ते न इत्तरा तू बल्लिये
लचका के कमर तू आपणी ज़रा
मेरे नाल तूं भंगड़ा पा ले नी
तैन्नु भंगड़ा पाऊणा चाही दा ई
तैन्नू मेरे नाल पाऊंदा चाही दा ई |
तेरे वांग दा यार मिन्नू चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू.......
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तेरी आख़ च शराब दा रंग कूड़े
तेरे बुल गुलाब दी पंखुड़ी ऐ
तेरी ज़ुल्फ़ ढले ते छाय वे घटा
राब्ब देख के तैन्नू शरमा जायेगी |
मिन्नू ऐदां दा ई सोना यार चाही दा ई
तेरे वांग दा यार मिन्नू चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू.......
.

मेरा दिल हुंकारा भरे सज्जना
मेरी छात्ती ते कांन रख वेख ज़रा
तेरा नाऊँ गाऊंदाए मेरा दिल मित्तरा
तेरे प्यार नु लाबदा ऐ दिल सजणा
तैन्नू मेरे नाल गाऊना चाही दा ई
तेरे वांग दा यार मिन्नू चाही दा ई |
इक ऐंज दा यार मिन्नू.......
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_______हर्ष महाजन

Thursday, April 30, 2015

मुद्दतों बाद मुक्त हुआ हूँ तेरी डायरी से ऐ 'हर्ष'

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मुद्दतों बाद............मुक्त हुआ हूँ तेरी डायरी से ऐ 'हर्ष',
महफ़िल-ए-ग़ज़ल हूँ मगर जुबां पर उतरने से डरता हूँ |


_________________हर्ष महाजन

Tuesday, April 28, 2015

तेरी जुल्फों से नज़र मुझसे हटाई न गई



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तेरी जुल्फों से नज़र मुझसे हटाई न गई,
नम आँखों से पलक मुझसे गिराई न गई |

मैं भी था फूल कभी पर था अंधेरों में खिला,
दिल था जुल्फों में सजूँ मुझसे बताई न गई |


इक वो आवाज़ मेरे दिल से टकराती रही,
दर्द सीने में था पर मुझसे जताई न गयी |


यूँ तो ख़्वाबों में तेरी...जुल्फें लहराती रहीं,
पर दिया-बाती कभी मुझसे जलाई न गई |


अब धुंआ इतना उठा मैं भी खामोश हुआ,
आग इतनी थी जली मुझसे बुझाई न गई |


___________हर्ष महाजन