इस ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के साथ कई कवि सम्मेलनों और महफ़िलों में शिर्कत करते हुए ज़हन से निकले अहसास, अल्फास बनकर किस तरह तहरीरों में क़ैद हुए मुझे खुद भी इसका अहसास नहीं हुआ | मेरे ज़हन से अंकुरित अहसास अपनी मंजिल पाने को कभी शेर, नज़्म , कता, क्षणिका, ग़ज़ल और न जाने क्या-क्या शक्ल अख्तियार कर गया | मैं काव्य कहने में इतना परिपक्व तो नहीं हूँ | लेकिन प्रस्तुत रचनाएँ मेरी तन्हाइयों की गवाह बनकर आपका स्नेह पाने के लिए आपके हवाले है उम्मीद है आपका सानिध्य पाकर ये रचनाएँ और भी मुखर होंगी |
Tuesday, August 14, 2018
Sunday, July 8, 2018
आज सूना हो गया
...
आज सूना हो गया दिल तेरे फिर* जाने के बाद,
सोचता हूँ होगा फिर क्या तेरे फिर आने के बाद ।
-------------------------हर्ष महाजन
*बदल
2122-2122-2122-212
आज सूना हो गया दिल तेरे फिर* जाने के बाद,
सोचता हूँ होगा फिर क्या तेरे फिर आने के बाद ।
-------------------------हर्ष महाजन
*बदल
2122-2122-2122-212
Friday, May 4, 2018
क्यूँ न अश्कों का साथी बनूँ हमसफर
...
क्यूँ न अश्कों का साथी बनूँ हमसफर,
जी रहा बिन तेरे ज़िन्दगी का सफर ।
आओ ठहरो तसव्वर में कुछ देर सँग,
हिज़्र कैसे सहूँ कैसे दूँ ये खबर ।
हर्ष महाजन
212/212/212/212
Thursday, March 1, 2018
आओ चढ़ा के रंग होली का मिला करें
...
आओ चढ़ा के रंग.. होली... .का मिला करें,
दिल में जगा के प्यार को आओ...दुआ करें ।
नीला हो या पीला हो या हो रसंग अब लाल,
रिश्तों में सब मिला के नया सिलसिला करें ।
हर्ष महाजन
Wednesday, February 21, 2018
अटूट रिश्ता (नज़्म)
दोस्तो आपकी अदालत में एक नज़्म पेशे खिदमत है उम्मीद है इसे अपने प्यार से ज़रूर नवाजेंगे ।अगर अच्छी लगे तो दो शब्द ज़रूर कहियेगा ।
------------------अटूट रिश्ता (नज़्म)
वो दोस्ती का जज़्बा कभी दिखा न सका,
दुश्मन तो था मगर दुश्मनी निभा न सका ।
कुछ एक फसाने हकीकत में बदले ज़रूर,
मगर जलालत में कुछ भी वो बता न सका ।
इंतिहा-ए-जुदाई-ओ-गम सब सहे उसने,
पर समंदर जो आंखों में था छिपा न सका ।
नाम ले ले कर मेरा बहुत कोसा किये था वो
कितना पागल था नफरत भी जता न सका ।
टूटकर चाहेगा वो ऐसा कभी कहा था उसने,
वो शख्स, जैसा भी था मैं भी भुला न सका ।
-------------------हर्ष महाजन
------------------अटूट रिश्ता (नज़्म)
वो दोस्ती का जज़्बा कभी दिखा न सका,
दुश्मन तो था मगर दुश्मनी निभा न सका ।
कुछ एक फसाने हकीकत में बदले ज़रूर,
मगर जलालत में कुछ भी वो बता न सका ।
इंतिहा-ए-जुदाई-ओ-गम सब सहे उसने,
पर समंदर जो आंखों में था छिपा न सका ।
नाम ले ले कर मेरा बहुत कोसा किये था वो
कितना पागल था नफरत भी जता न सका ।
टूटकर चाहेगा वो ऐसा कभी कहा था उसने,
वो शख्स, जैसा भी था मैं भी भुला न सका ।
-------------------हर्ष महाजन
Tuesday, February 20, 2018
यूँ न आंखों से बातें किया कीजिये
यूँ न आँखों से बातें किया कीजिये,
इश्क़ का यूँ सबक न दिया कीजिये ।
हम तो नादान हैं प्यार में कुछ सनम,
तुम ख़बर कुछ तो दिल की लिया कीजिये ।
गम की ग़ज़लें चलें अश्क़ तुम थाम कर,
टूटे दिल को न यूँ ही सिया कीजिये ।
हम तो डरते हैं बदनामी से शह्र में,
ज़िक्र तुम इश्क का न किया कीजिये |
गम की गहराइयों से जो गुज़रो कभी,
इल्तिज़ा अश्क तुम न पिया कीजिये ।
फ़ासला दरमियाँ अब हमारे कहाँ,
फ़ासलों में सनम न ज़िया कीजिये ।
जब भी आँखों से टपके नशा प्यार का,
हम नज़र से पिलायें पिया कीजिये ।
----------------हर्ष महाजन
बहरे-मुतदारिक मसम्मन सालिम
212 212 212 212
1) मेरे रश्के क़मर तू ने पहली नज़र
जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया
2) हर तरफ़ हर ज़गह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी.
काश आज भी पुराना जमाना होता,
काश आज भी......पुराना जमाना होता,
तुझ संग मेरा भी....इक अफसाना होता ।
कुछ भी बदल लेते..हाथों की लकीरों में,
पर ज़िन्दगी का सफर खूब सुहाना होता ।
----------------हर्ष महाजन
Monday, February 19, 2018
इश्क़ तक तुझे तैयार करूँ ज़ायज़ नहीं लगता
इश्क़ तक तुझे तैयार करूँ ज़ायज़ नहीं लगता,
अनचाहा फिर खुमार भरूँ ज़ायज़ नहीं लगता ।
चाहत तो है तेरे हुस्न का दीदार कर लूँ मगर,
दहलीज़ पे इंतज़ार करूँ...ज़ायज़ नहीं लगता ।
----------------हर्ष महाजन
हद से ज़्यादा प्यार करना भी गुनाह हो गया
हद से ज़्यादा प्यार करना भी गुनाह हो गया,
वो रिश्ता कुछ यूं बना कि घर तबाह हो गया ।
------------------------हर्ष महाजन
Monday, February 12, 2018
फासला रखना हमेशा अच्छे हों जितने ये लोग
फासला रखना हमेशा अच्छे हों जितने ये लोग,
होती मीठी सी ज़ुबाँ अंदर से ज़हरीले ये लोग ।
मुस्कुराते रहते हैं ये......फूल कांटों संग भी,
ये हुनर सिखला दे कोई क्यूँ हैं पथरीले ये लोग ।
-----------------हर्ष महाजन
ख़्वाबों का सिलसिला क्या बताऊँ ऐ 'हर्ष,
...
ख़्वाबों का सिलसिला क्या बताऊँ ऐ 'हर्ष,
हालात-ए-इश्क से बे-खबर लगता है शायद तू |
_______हर्ष महाजन
यूँ ही मुहब्बत में बर्बाद होना किसे अच्छा लगता है
यूँ ही मुहब्बत में बर्बाद होना किसे अच्छा लगता है,
मगर हौंसिले बुलंद हों तो हर ज़ख्म सुहाना लगता है |
_______________________हर्ष महाजन
इतना भी तो आसां नहीं किसी शेर को कह पाना
...
इतना भी तो आसां नहीं किसी शेर को कह पाना,
इक-इक लफ्ज़ मुहब्बत हार कर पिरोना पड़ता है |
___________________हर्ष महाजन
कुछ दर्याफ़्त करना भी अब गुनाह सा लगता है,
...
कुछ दर्याफ़्त करना भी अब गुनाह सा लगता है,
भुला दो तुम भी वो लम्हें यही वफ़ा सा लगता है |
___________________हर्ष महाजन
Monday, November 13, 2017
ये लफ्ज़ मेरे, सोच मेरी, नग्में भी मेरे,
...
ये लफ्ज़ मेरे, सोच मेरी, नग्में भी मेरे,
अब जाने क्यूं ख्याल सभी उनमें हैं तेरे ।
ये शाम भी हँसी-हँसी है वक़्त में वफा,
फ़िर जाने तेरी यादों में आँसू है क्यूँ मेंरे ।
--------------------हर्ष महाजन
221 2121 1221 212
ये लफ्ज़ मेरे, सोच मेरी, नग्में भी मेरे,
अब जाने क्यूं ख्याल सभी उनमें हैं तेरे ।
ये शाम भी हँसी-हँसी है वक़्त में वफा,
फ़िर जाने तेरी यादों में आँसू है क्यूँ मेंरे ।
--------------------हर्ष महाजन
221 2121 1221 212
Saturday, November 11, 2017
चलो आज उन्हें बता कर देखते हैं
...
चलो आज उन्हें बता कर देखते हैं,
तसव्वुर दिल के जता कर देखते हैं ।
बहुत खेल ली खुद से आंख मिचौली,
चलो आज उन्हें मना कर देखते हैं ।
-------------हर्ष महाजन
चलो आज उन्हें बता कर देखते हैं,
तसव्वुर दिल के जता कर देखते हैं ।
बहुत खेल ली खुद से आंख मिचौली,
चलो आज उन्हें मना कर देखते हैं ।
-------------हर्ष महाजन
Wednesday, August 23, 2017
मेरे किस्से मेरी दुनिया भी कोई जाना नहीं
...
मेरे किस्से मेरी दुनिया भी कोई जाना नहीं,
दर्द कितना मेरे दिल में था कोई माना नहीं |
साथ रहते थे..........तसव्वुर का पता देते थे,
पहले दीवाने बहुत... अब कोई दीवाना नहीं |
____________हर्ष महाजन
Thursday, August 3, 2017
अश्कों की दास्तां है, यूँ ही दर्ज हुआ करती है ऐ 'हर्ष',
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अश्कों की दास्तां है, यूँ ही दर्ज हुआ करती है ऐ 'हर्ष',
वरना अहसासों से उठे सैलाब ज़िन्दगी को तोड़ देते हैं ।...
--------------------–हर्ष महाजन
अश्कों की दास्तां है, यूँ ही दर्ज हुआ करती है ऐ 'हर्ष',
वरना अहसासों से उठे सैलाब ज़िन्दगी को तोड़ देते हैं ।...
--------------------–हर्ष महाजन
ज़ख्म दर ज़ख्म अपने अहसास इन शेरों में प्रवेश करता हूँ
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ज़ख्म दर ज़ख्म अपने अहसास इन शेरों में प्रवेश करता हूँ
बस दिल के कुछ टुकड़े हैं जो रोज़ किश्तों में पेश करता हूँ ।
_______________________हर्ष महाजन ।
ज़ख्म दर ज़ख्म अपने अहसास इन शेरों में प्रवेश करता हूँ
बस दिल के कुछ टुकड़े हैं जो रोज़ किश्तों में पेश करता हूँ ।
_______________________हर्ष महाजन ।
Thursday, July 20, 2017
इतनी उम्मस है फलक को तू हिलाने वाले
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इतनी उम्मस है फलक को तू हिलाने वाले,
ये घटा बरसेगी कब....दुनियाँ चलाने वाले ।
---------------------हर्ष महाजन
इतनी उम्मस है फलक को तू हिलाने वाले,
ये घटा बरसेगी कब....दुनियाँ चलाने वाले ।
---------------------हर्ष महाजन
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