Wednesday, September 23, 2015

न खेल दिल्लगी का तू कुछ तो खुदा से डर

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न खेल दिल्लगी का तू कुछ तो खुदा से डर,
इतना कहर है, आह में उसकी, सजा से डर |
लेकर बहाना अम्न का पल-पल करे क्लेश,
अपने जहाँ में आग लगे इस अदा से डर |
हर्ष महाजन

Tuesday, September 22, 2015

ऐ ज़िंदगी सलाम तुझे....क्या किया सितम

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ऐ ज़िंदगी सलाम तुझे....क्या किया सितम.
इक पल में दे गयी तू मुझे अतीत और गम |
लखते जिगर को छीन तुम्हें क्या सकूं मिला,
कुछ तो बता कसूर मेरा.......या बता करम |


________हर्ष महाजन

टूटी है दिल के आज मेरे दरम्यान ज़िंदगी

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टूटी है दिल के आज मेरे दरम्यान ज़िंदगी,
जब से हुई है तुझसे मेरी पहचान ज़िन्दगी |

___________हर्ष महाजन

Friday, August 28, 2015

बड़ी मुश्किल से पाला है वो दुश्मन राज़ की खातिर

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बड़ी मुश्किल से पाला है वो दुश्मन राज़ की खातिर,
तेरा भी नाम हो जाए..........मेरा इंतिकाम हो जाए |

______________हर्ष महाजन

Tuesday, August 25, 2015

ऎ खुदा हो सके तो इक बार उनसे मिलने की बारी रखना

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ऎ खुदा हो सके तो इक बार उनसे मिलने की बारी रखना,
वरना अकेली हूँ अपनी अदालत में मेरी भी तैयारी रखना ।

-------------------–-हर्ष महाजन

Tuesday, August 11, 2015

गाफिल, तू मुझको ये बता किस-किस पे नज़र है

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गाफिल, तू मुझको ये बता किस-किस पे नज़र है,
चलना मगर, इस राह की, मुश्किल ये डगर है |

इंसान की तहजीब पर दौलत का है दखल ,
पर भूलता है मुक्तसिर उसका ये सफ़र है |

किस-किस करम से जूझता है आदमी यहाँ,
अब क्या किये, ज़ुल्मो सितम, खुद को भी खबर है |

इतना कहर था बादलों का उजड़ी बस्तियां,
टूटा, लगे बरसात का जितना भी सबर है |

जिनके लिए हंसती रही जो आँखें उम्र भर,
छोड़ा हैं, ऐसा गम वहाँ अब तक वो असर है |

०००
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हर्ष महाजन

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2212   2212   2212  12

Monday, August 10, 2015

जहाँ दर्द चले मद्धम-मद्दम ( गीत )


गीत
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जहाँ दर्द चले मद्धम-मद्दम, वहां दिल में उमंग भी लंबा रे,
जहाँ हुस्न हुआ बेकल-बेकल, वहां प्यार का रंग भी मंदा रे |
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जब रात हो कटती गरमी में, बरसात में भी बरसात नहीं,
सब वादे वहां फिर दफ्न हुए, हुआ मौसम इश्क का गंदा रे |
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जहाँ फूल खिलें गुलशन-गुलशन, पतझड़ का फिर वहां काम है क्या ,
जहाँ कलियाँ डाल से झरने लगें, माली का उस पर फंदा रे |
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इस शहर की शानो शौकत में, अब इश्क भी नामुमकिन सा हुआ,
हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, रंगरलियों का अब ये धंधा रे |
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कभी सूली पर ईमान चढ़ा, कभी फंदा नफरत का था चढ़ा,
पर झूठा सच्चा जो भी चढ़ा, हर बार खुदा का ही बंदा रे |

हर्ष महाजन

Wednesday, July 22, 2015

बरबादियों की...रुदाद ग़ज़ल

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बरबादियों की...रुदाद ग़ज़ल,
बदनामियों का जवाब ग़ज़ल |

हो अजब सी दास्ताँ हुस्न गर,
ज़ख्मों भरी है अज़ाब ग़ज़ल |


ज़िंद से जहाँ हो....गिला बहुत ,
दर्द-ए-निहाँ सी सवाल ग़ज़ल |


बेताबियों का हो......सबब जहाँ,
लबरेज़ हुस्न-ओ-ज़माल ग़ज़ल |


आँखों में अनहद अश्क हो जब,
महरूमियत की मिसाल ग़ज़ल |


हर्ष महाजन



  रुदाद =कहानी

Tuesday, July 21, 2015

कलयुग में खूब बिकेगा वो ईमान ही होगा

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कलयुग में खूब बिकेगा वो ईमान ही होगा,
इंसान का दुश्मन......यहाँ इंसान ही होगा |
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दलदल बनेंगे रिश्ते....हर पोशाक पर पैबंद,
दिल खुद का देखें हम तो बेईमान ही होगा |

जब कासिदों के संग दिखेगा अपना दीवाना,
दुश्मन यहाँ दुश्मन का...कदरदान ही होगा |

आतंकियों की देश में अब जात नहीं होती,
अब दोस्तों मत कहना मुसलमान ही होगा |

बुजदिल करेंगे राज़.......राजदार नहीं होंगे.
नफरत यहाँ पर हर तरफ तूफ़ान ही होगा |

हर्ष महाजन

Monday, July 20, 2015

जो खुश्क हुए थे ज़ख्म, उनमें दर्द आज भी है



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जो खुश्क हुए थे ज़ख्म, उनमें दर्द आज भी है,
वो ज़िंदा हैं तो नहीं, दिल में भ्रम आज भी है | 

मैं जानता हूँ मुझे, उसका कभी इंकार न था,
मगर इस रूह पर, उसका वो क़र्ज़ आज भी है |


दिल बे-जुबां हुआ, शराब साज़-ए-दिल थी बनी,
शर्मिन्दा हूँ मुझे, बेशक वो मर्ज़ आज भी है |


तलाशता हूँ शहर, अज़ाब दिल का कहाँ मैं सहूँ,
किया जो मैंने मुझे, उसकी शर्म आज भी है | 


जलेगा सदियों तलक, इक दिया मज़ार पे अब,
पत्थर हुआ हूँ मगर, मेरा कर्म आज भी है |


हर्ष महाजन

Thursday, July 16, 2015

मुझको इस शहर में…ऐसे भी नज़ारे थे मिले

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मुझको इस शहर में…ऐसे भी नज़ारे थे मिले,
दिन में कातिल कभी रातों को सहारे थे मिले |

वो थे क्या दिन सभी इल्जाम तेरे सर थे लिए,
फर्क इतना सा था बस तुझ से इशारे थे मिले |


जाने कैसा था भंवर दुनियां का हम खो से गए,
ये तो किस्मत थी कि दोनों को किनारे थे मिले |


साज़-ए-दिल बजते रहे महफ़िल-ए-गम चलती रही,
सारी गज़लों में थे पल संग जो गुजारे थे मिले |


जब भी तन्हाई में वो.....बन के आवारा से मिले,
अपनी ज़िन्दगी के “हर्ष’ दिन जो उधारे थे मिले |


हर्ष महाजन

Wednesday, July 15, 2015

मन के साए से तुझे खुद ही रिहा कर दूंगा

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मन के साए से तुझे खुद ही रिहा कर दूंगा,
मेरा वादा है तुझे दिल से जुदा कर दूंगा |

कैसे कर दूं मैं क़त्ल दिल से तेरी चाहत का,
तूने चाहा तो अगर ये भी खता कर दूंगा |


मेरी आँखों से कभी बन दर्द तू टपकेगा,
तेरी खुशियों में मुस्करा के हवा कर दूंगा |


दिल की अब सरहदों पे खूब अँधेरा है अगर,
तो दिल मैं आतिश-ए-जफा से दिया कर दूंगा |


जहाँ में सब का अपना-अपना मुक़द्दर लेकिन,
जो रिश्ता तुझसे जुड़ेगा मैं रिहा कर दूंगा |


हर्ष महाजन

Sunday, July 12, 2015

इन हवाओं से कभी मेरा पता पूछोगे

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इन हवाओं से कभी.....मेरा पता पूछोगे,
किस तरह आता मुझे तेरा नशा पूछोगे |

तूने जो ली थी कसम मुझसे जुदा होने पर,
मेरी धड़कन की सदाओं से सजा पूछोगे |


अब तलक मैंने जलाईं थीं हजारों ही शमा,
यूँ अंधेरों में बता किस से पता पूछोगे |


बेरहम यादें चलीं आहों में आंधी की तरह,
है असर इतना कि कण-कण से खुदा पूछोगे |


जब से रातों में दिखे रूहें जुगनुओं की तरह,
था कहाँ मैंने जलाया था दीया पूछोगे |


_____________हर्ष महाजन 


Friday, July 10, 2015

मेरा दिल मुझसे बदगुमां लेकिन

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मेरा दिल मुझसे बदगुमां लेकिन,
है ये कातिल पर रहनुमां लेकिन |
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हर पल रंगीन महफ़िलों पे फ़िदा,
हरसूं ज़ख्मों के हैं निशां लेकिन |

कितने हैं दर्द अश्क कहते हैं अब,
दिल में रोशन है इक शमा लेकिन |

हर इक सदमें में संग रोया बहुत,
मुझपे इतना था मेहरबां लेकिन |

कितने ही दर्द इश्क में था लिए,
बंद है दिल की अब जुबां लेकिन |

इश्की लाजवाब ग़ज़ल कैसे कहूँ,
न अश्क रुके न दर्द थमा लेकिन |

_______हर्ष महाजन

Wednesday, July 1, 2015

हाथ की ये लकीरें मेरी.....इधर-उधर जाती नहीं

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हाथ की ये लकीरें मेरी.....इधर-उधर जाती नहीं,
हैं तो अपनी ये मगर...समझ में क्यूँ आती नहीं |
खुद ये खामोश मगर इनमें किस्मत का ज़िकर,
कितनी बेवफा हैं कोई गम का पल बताती नहीं |

हर्ष महाजन

ग़लत-फ़हमियां थीं बढीं फासले बढ़ते रहे



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ग़लत-फ़हमियां थीं बढीं फासले बढ़ते रहे,
हम महोब्बत में थे वो दुश्मनी करते रहे |

दिल से मजबूर हैं हम तबादला कैसे करें,
इंतिहा इतनी बढी फिर सितम ढलते रहे |


इश्क में दाग हुआ बे-वफ़ा इश्क जो हुआ,
मौत पहलू में लिए जलते ओ बुझते रहे | 


इश्क आंधी तब हुआ खार जुल्फों में सजा,
रात हम सोते रहे........ख्वाब गैर होते रहे |


था गुमाँ इतना हमें अपनी इस खामोशी पर,
पर समंदर जब हुए ये ज़ख्म सिसकते रहे |


_____________हर्ष महाजन

Tuesday, June 30, 2015

तनहा रहकर अपनों की याद खूब आती है

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तनहा रहकर अपनों की याद खूब आती है,
अब मगर अपनों से मुलाकातें नहीं होती |

___________हर्ष महाजन

Saturday, June 27, 2015

बे-सबब आज उदासी क्यूँ है....बहुत दिल में

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बे-सबब आज उदासी क्यूँ है....बहुत दिल में,
इश्क न पहले था न आज मुहब्बत दिल में |
जलता फिरता हूँ पढ़-पढ़ के तेरे ख़त यूँ ही,
जाने क्या बात.....हुई ख़ाक उल्फत दिल में |

________________हर्ष महाजन

Friday, June 12, 2015

मुब्तिला इश्क में वो एहसास-ए-अदब भूल गए

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अपनी मंजिल के लिए होश-ओ-खबर खो के चले,
बा-वस्फे शौक़ दुश्मनी.........वो मगर बो के चले | 

मुब्तिला इश्क में वो....एहसास-ए-अदब भूल गए,
बंद आखों से अपनी....शाम-ओ-सहर खो के चले |


हमारा जौक-ए-सितम अब...फलक को छूने लगा,
बिखर तो हम भी गए पर......वो मगर रो के चले | 


ये इश्क शोला हुआ......शिद्दत-ए-ख़ुलूस टूट गया,
ये साँसे चलती रहीं हाथ...........मगर धो के चले |


छुपे हैं घाव हज़ारों............अभी पर ज़िंदा हैं हम,
जहाँ को छोड़ कर हम........खूब मगर सो के चले |



हर्ष महाजन



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मुब्तिला = मसरूफ

बा-वस्फे शौक़ = इच्छा के बावजूद

एहसास-ए-अदब = शिष्टाचार का अनुभव

जौक-ए-सितम = अत्याचार सहने का शौक़

शिद्दत-ए-ख़ुलूस = सच्ची दोस्ती, मैत्री
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अपनी मंजिल के लिए...होश-ओ-खबर खो के चले

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अपनी मंजिल के लिए...होश-ओ-खबर खो के चले,
बा-वस्फे शौक़ दुश्मनी...........वो मगर बो के चले |
मुब्तिला इश्क में वो.....एहसास-ए-अदब भूल गए,
वो बंद आखों से अपनी शाम-ओ-सहर खो के चले |
__________________हर्ष महाजन


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मुब्तिला = मसरूफ
बा-वस्फे शौक़ = इच्छा के बावजूद
एहसास-ए-अदब = शिष्टाचार का अनुभव