Monday, April 12, 2021

कौन जाने इतना गहरा किसका नश्तर था चला

 ★★★★★★★नज़्म★★★★★★★★


अनकही बातें न जानें दिल में कितनी ले गया,

उँगलियाँ अपनों की यूँ....दांतों तले वो दे गया ।


कौन जाने इतना गहरा किसका नश्तर था चला,

अपने हाथों, की लकीरों....,..को दगा वो दे गया ।  


क्या चलेगी बेगुनाही.....की कलम अबकी यहॉं ?

किसने दी ऐसी सज़ा.....वो ज़िंदगी ही से गया ।


है दुआ, बातों से निकले.....राह कोई अब यहाँ,

वर्ना लिख देना जहाँ में, अपना, अपनों से गया ।


थी शिकायत उससे.......पाबंदी-ओ-शर्तें बेसबब,

बिन अदालत आपकी ख़ातिर वो जाँ तक दे गया । 


कितना तड़पा होगा वो उस आख़िरी पल में फ़क़त,

लिख मुकद्दर, ख़ुद वो अपना, रूह जहाँ से ले गया ।


ये खुदा की नैमतें हैं.........हम सभी ज़िंदा खड़े,

कौन जाने किसने जाना था.....किसे वो ले गया ।


पूजा कर-कर उम्र बीती दिल में क्यों नफ़रत अबस,

अब वो महफ़िल में नहीं पर दिल में नफरत ले गया ।


कुछ के दिल में थी अदावत* कुछ में रिश्ता नाम का,

इस तरह, वो संग, सबके रंजो गम......सब ले गया ।


रंजिशें किसकी थीं कितनी, ज़ह्र भी इतना था उफ़,

ऐ ख़ुदा तू ये बता अब.......ये गुनाह किस पे गया ।

 

इससे ज़्यादा ये तमाशा...........कौन देखेगा यहॉं,

तज़रुबा अपने हलातों.............का मगर वो दे गया ।


------हर्ष महाजन 'हर्ष'


*अदावत = शत्रुता


बह्र तर्ज़: आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे


2122 2122 2122 212


◆◆◆

Sunday, August 30, 2020

*जन्म-दिन की बहुत बहुत मुबारक हो बेटा शौर्या*

🍪🍪🍪🍪🍪🍪🍪🍪
🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩
तेरी हसरत भी हो, और हो राजदार,
खुशियाँ रूपी ये दरिया में कश्ती हो पार ।
✈️
इन हवाओं में खुशबू यूँ बसती रहे,
ये जन्म-दिन पे पन्नें लिक्खूँ बार-बार ।
✈️
है समंदर में जब तक यूँ पानी रहे,
तेरे घर का ये आँगन रहे  गुल-बहार।
✈️
तेरे दामन की ख़ुशियाँ फलक छू लें गर,
अपने दादू को बेटा न भूलना तू यार ।
✈️
हृदय-तल से जन्म-दिन की है ये कसक,
ऐसे दिन मौका मुझको मिले  बारम्बार ।
✈️

बहुत बहुत मुबारक

*हर्ष महाजन*

तर्ज़:बह्र

*देखती ही रहो आज दर्पण न तुम*
प्यार का ये महूरत निकल जाएगा, निकल जाएगा

Wednesday, July 8, 2020

रदीफ़ दोष :: पोस्ट-5

■■पोस्ट-5■■
◆◆रदीफ़ दोष◆◆
●●●(d)तक़ाबूले रदीफ़●●●

इस दोष से ग़ज़ल कहने वालों को हो सके तो बच के निकलना चाहिए । इस दोष के चलते ग़ज़ल जानने वाले कहने वालों की काबलियत को आंकने की कोशिश करते हैं ।

तकाबुले रदीफ़ दोष के भेद हैं :-

तकाबुले रदीफ़ दोष के दो भेद होते हैं :---

1) लाज्तमा-ए-ज़ुज्ब-ए-रदीफैन

2)लाज्तमा-ए-तकाबुल-ए-रदीफैन

**क्रमश:**

■■अगला पोस्ट-6■■
◆◆रदीफ़ दोष◆◆
●●तक़ाबूले रदीफ़-●●
★★(1)लाज्तमा-ए-ज़ुज्ब-ए-रदीफैन ★★

Tuesday, June 30, 2020

रदीफ़ दोष:: पोस्ट-4

■■Post-4■■
◆◆रदीफ़ दोष◆◆
●●(c) रब्त का न होना●●
***************
 प्रिय पाठकों:
ग़ज़ल कहन अगर आसाँ कहें तो ये हमारी भूल होगी । ये एक ऐसी विदा है जिसकी अथाह गहराई को समझने के लिए बहुत ही सहनशीलता और विनम्रता चाहिए ।  आजकल के लेखक की किसी कृति पर अगर किसी को कोई सुझाव भी दे दिया जाए तो इंसान विफऱ जाता है । वो व्यक्ति कहां इस विदा में तरक्की कर पायेगा ?

इस विदा में हर व्यक्ति अधूरा है यही समझो कि समझने के लिए समंदर अभी बाकि है मैं कम इल्मी इंसान आप जैसे धुरंदर कहने वालों को क्या सीखा पाऊंगा ? यही समझना कि मैंने अपने गुरु से जो कुछ भी सीखा बस वही तकसीम करने की कोशिश भर है । ग़ज़ल विदा को जब भी शुरू कीजियेगा अपने गुरु को हमेशा याद कीजियेगा आपकी विदा में चार चांद ज़रूर लगेंगे । बात कर रहे थे रदीफ़ के बारे में -----

कहे गए शे'र में जो रदीफ़ इस्तेमाल किया गया है अगर उसका कोई ओचित्य न हो या उसका रदीफ़ बेवजह ठूँस दिया गया हो या अर्थहीन जान पड़ता हो तो उस से शे'र में हल्कापन आ जाता है । इसे जानने के लिए सबसे आसान तरीका यह है कि रदीफ़ को हटा कर देखा जाए । अगर आपकी कही तहरीर में कोई भी फर्क नहीं पड़ता तो समझ लेना चाहिए कि वो भर्ती की रदीफ़ इस्तेमाल की गई है ।

ग़ज़ल की बाबत के मुताबिक एक उदाहरण लेते हैं:
आप जो हमसे दूर गए,
दिल से हम मज़बूर गए
आप न थे तो क्या थे हम
आपसे मिल मशहूर गए

आप देखेंगे सब कुछ सही सलामत यथावत लिया गया है । रदीफ़-क्वाफी भी एक दम दुरुस्त है । लेकिन पहली पंक्ति में रदीफ़ सही तरह से ली गयी है ।

मतला के सानी में और दूसरे  शे'र के सानी में रदीफ़  का निर्वाह ठीक नही हुआ ।
यहां रब्त नहीं बना ।

सही क्या है ?

आप जो हमसे दूर हुए,
दिल से हम मज़बूर हुए
आप न थे तो क्या थे हम
आपसे मिल मशहूर हुए

एक और बात:

दोस्तो रदीफ़ के अपने ही बेमिसाल कुछ नियम हैं----

*रदीफ़ का काफ़िये के साथ पूर्ण रब्त या तालमेल हो यानि काफ़िया और रदीफ़ एक सार्थक जोड़ी बनाते हो और बेमेल न हों। जैसे–
फ़साना सुनाओ/ तराना सुनाओ के साथ ‘कोई गीत पुराना सुनाओ’ तो चलेगा, लेकिन ‘मुझे दिल चुराना सुनाओ‘ कैसे फिट होगा, क्योंकि चुराना सिखाओ हो सकता है, सुनाओ कैसे होगा?
*काफ़िये के लिंग, वचन ( singular/plural)और काल का रदीफ़ के साथ रब्त होना चाहिए। जैसे–
खता हो गई/ दुआ हो गई/ हवा हो गई के साथ ‘भला हो गई’ का कोई रब्त नहीं है, क्योंकि यहाँ ‘भला हो गया’ सही है।
रिसाला मिला/ उजाला मिला/ निवाला मिला के साथ ‘सबके होठों पर ताला मिला’ सही नहीं है क्योंकि ‘सबके होठों पर ताले मिले’ सही होगा।

कई बार देखा गया कि ऐसे ऐसे शेर बना दिये जाते है जहाँ ग़ज़ल में दो या तीन शेर तो सही रदीफ़ से मेल खाते हुए बने बाकि सभी शेरों में बिना रब्त के रदीफ़ इस्तेमाल कर दिया गया ।

***क्रमश:***

◆◆अगला पोस्ट-5◆◆रदीफ़ दोष (d)तक़ाबूले-रदीफ़◆◆

#

Monday, June 29, 2020

रदीफ़ दोष:: पोस्ट-3

◆Post-3◆

रदीफ़ दोष (b)

■■​तहलीली रदीफ़ ■■
★★★★★★★★★★

ग़ज़ल कहने वाले रदीफ़ तो जानते हैं मगर तहलीली रदीफ़ के बारे में कम ही लोग वाक़िफ़ हैं। आओ तहलीली रदीफ़ क्या होता है आज ये भी देख लें :-
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

जब रदीफ़ इस तरह से क़ाफिये के बाद आये कि वह क़ाफिये में योजित हो जाए… सरल शब्दों में कहा जाए तो मिक्स (MIX) हो जाए तो ऐसे रदीफ़ को तहलीली रदीफ़ कहते हैं।

उदाहरण
●●●●●●
सब से मिलता है जो रो कर
रह न जाये ख़ुद का हो कर ।

ले मज़ा आवारगी का
मंज़िलों को मार ठोकर ।

 ऊपर मतले के अनुसार 'रो', 'हो' काफ़िया है और 'कर' रदीफ़ है ।
मगर दूसरे शेर में ' ठोकर' शब्द में काफ़िया और रदीफ़ आपस में जज़्ब होकर प्रयोग हुए हैं । अर्थात रदीफ़ काफिये के साथ चस्पा हो गयी है । इसे ही तहलीली रदीफ़ कहते हैं ।

■■नोट"■■

अधिकतर उर्दुदान इसे तहलीली दोष मानते हैं । लेकिन कुछ अरूजी इसे दोष नहीं मानते ।
★★★★★★★★

■■क्रमशः■■

◆◆अगला Post-4-रदीफ़ दोष(c) रब्त न होना◆◆

Saturday, June 27, 2020

रदीफ़ दोष :: पोस्ट- 2

◆Post-2◆

(1) रदीफ़ दोष (a)
दोस्तो काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है।
ये थोड़ी सी जानकारी इसलिए देनी ज़रूरी समझी कि अभी जिस बारे में बात होनी है उसका टॉपिक यही है ।

प्रिय पाठकों: ग़ज़ल कहन को अगर हम आसान कहें तो वह ठीक न होगा । इस विदा को बड़े ही सहज भाव से तथा बड़ी सहनशीलता से ही सीखा जा सकता है । इसे समझने के लिए अथाह गहराई तक समंदर को नापने जैसा अनुभव प्राप्त करने का मादा होना चाहिए । लेकिन आजकल के नए नए लेखकों को उनकी ज़रा सी गलती बताने कोशिश एक बड़ा विवाद खड़ा कर देती है । दोस्तो ग़ज़ल एक पूजा है और शुरू करने से पहले अपने गुरु को ज़रूर नमन करा कीजिये । देखना आपका मुकाम कहां तक हासिल होता है । हम बात जार रहे थे रदीफ़ की ।
#रदीफ़ से ताल्लुक बात करते हुए हमें ये जान लेना ज़रूरी है वो कौन सी बातें हैं जिनकी वजह से रदीफ़ में दोष पैदा हो जाता है ।
a) रदीफ़ का अंश या हर्फ़ बदलना ।
b) तहलीली रदीफ़
c) राब्ता न होना
d)तक़ाबूले रदीफ़

अब हम एक एक कर के सब के बारे में बात करेंगे ।

रदीफ़ के बारे में विस्तार से जानने के बाद सबसे पहले हर लेखक/ग़ज़लकार को ये मालूम हो चुका है कि ग़ज़ल में हम रदीफ़ या उसका कोई #अंश बदल नहीं सकते अन्यथा उसमें दोष पैदा हो जाएगा ।

उदारण:

***
हम तो अपनों से सब ही हारे थे,
जुर्म कुछ उनके कुछ हमारे थे ।

बे-वफ़ाओं से थी निभाई वफ़ा,
अब वो मुश्किल में सब किनारे है

ऊपर मतले में 'थे" रदीफ़ तय किया गया है अब एक बार तय होने के बाद आगे के अन्य शे'रों में "है" नहीं ले सकते, यहाँ रदीफ़ का दोष आ जायेगा ।

ऊपर कहे शेरों का निराकरण--

हम तो अपनों से सब ही हारे थे,
जुर्म कुछ उनके कुछ हमारे थे ।

बे-वफ़ाओं से थी निभाई वफ़ा, अब वो मुश्किल में सब किनारे थे ।

***क्रमश:*****

◆◆◆आगे रदीफ़ दोष (b) तहलीली रदीफ़◆◆◆◆Post-3◆

Thursday, June 25, 2020

रदीफ़ दोष -पोस्ट-1

◆Post-1◆

#पहला
5-5-2020

#दोषयुक्त_ग़ज़ल

दोस्तो आज हम ग़ज़ल में उत्पन्न दोष की बात करेंगे ।
प्रभावपूर्ण ग़ज़ल कहने के बाद हमें देखना पड़ता है कि हमारी ग़ज़ल में कोई कमी तो नहीं रह गईं जिसके कारण उसमें कोई दोष तो नहीं रह गया ।

ग़ज़ल में दोष कई प्रकार के होते हैं ।
ग़ज़ल के
1) रदीफ़ में दोष
2) काफ़िया में दोष
3) बहर का दोष
4) भाषा का दोष
आदि-आदि ।

सबसे पहले हम बात करेंगे...रदीफ़ दोष के बारे में....

◆◆क्रमश:◆◆
◆◆आगे रदीफ़ दोष(a)◆Post-2◆

Monday, June 15, 2020

उठ के मैयत से निकल कह दो मना लें

***

उठके मैयत से निकल कहदो मना लें तुमको,
तू सितारा है ज़मीं पे तो बुला लें तुमको ।

शोहरत ने जो तुम्हें आज चुराया हमसे,
हम भी नग्मों में सनम आज सजा लें तुमको ।

तेरे ग़म में जो कभी शौक़ यहाँ पाले थे,
चल के मैख़ाने में सोचा कि दिखा लें तुमको ।

तेरी हसरत कि निग़ाहों से गिरा दे हमको,
अपनी हसरत कि निगाहों में उठा लें तुमको ।

जिन चराग़ों से मिली रौशनी मंज़िल के लिए,
आओ किस्मत के अँधेरों से बचा लें तुमको ।

हमने सोचा था कि इक शाम तेरे नाम करें,
दिल ने फिर चाहा उसी शाम मना लें तुमको ।

अपने तुम प्यार को सब नाज़ से रखना लेकिन,
सोचा खोया है सनम अपना बता लें तुमको ।

दिल मुहब्बत के अगर लम्हों को जीना चाहे,
मेरी मैयत में मिलेंगे वो सँभाले तुमको ।

-----हर्ष महाजन 'हर्ष'
2122 1122 1122 22(112)
दिल की आवाज भी सुन दिल के फ़साने पे न जा

Friday, May 29, 2020

हिचकियाँ


***
यूँ न मजबूर करो
मुझे
अपनी हिचकियों से इस कदर,
मुझे भी तो
ख्याल है
तेरे बे-सब्र जज़्बे का ।

----हर्ष महाजन

Thursday, May 28, 2020

आइये समंदर को बदल डालें

...

आइये आज समंदर को बदल डालें ,
मेरे  कुछ शेर हैं उनमें वज़न डालें |
मगर बदलूं कैसे बदनसीब मुक़द्दर, 
चलो हाथ की लकीरों में खलल डालें |

_________हर्ष महाजन

मेरा वज़ूद

***

ये आईना नहीं,
 मेरे वज़ूद का सबूत है,

वरना कभी कोई, 
मेरा पैरवीकार न होता ।

....हर्ष महाजन

Sunday, May 10, 2020

यादों का दीप जला ये दिल में दर्द उठा

***


यादों का दीप जला  ये दिल में दर्द उठा
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

तेरे हाथों की महक म अब भी आती है सदा,
तेरे मुखड़े की झलक , आये सपनों में सदा,
न छिनना ये सिलसिला, मिले है सकून बड़ा,
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

बचपन के दिन वो मेरे, जो बीते संग माँ तेरे,
थे दिन तेरे गीतों भरे बसे जो अंग अंग नेरे,
न भूलूँ उनको सदा है उनमें जादू भरा
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

***
written in 1980's

Wednesday, April 8, 2020

नुक़्ता क्या होता है ?



नुक़्ता

ग़ज़ल कहते वक़्त जब हम शब्दावली का प्रयोग करते हैं तो अक्सर हम उर्दू के लफ़्ज़ भी इस्तेमाल करते हैं । लेकिन लफ्ज़ के ग़लत इस्तेमाल से ग़ज़ल के अर्थ का अनर्थ हो जाता है ।

नुक़्ता किस तरह इसे लिखने में प्रयोग करते हैं ।

नुक़्ता वैसे तो ये एक अरबी भाषा का लफ्ज़  होता है, जिसका सामान्य भाषा में मतलब बिंदु होता है। इसकी पहचान बहुत ही आसान है। क्योंकि ये किसी अक्षर के नीचे लगा बिंदु होता है। जैसे ज़, क़, ख़ आदि। अगर ये किसी अक्षर के साथ लग जाता है और उससे किसी शब्द का निर्माण होता है, तो उसका अर्थ सामान्य शब्द से यानी बिना बिंदु वाले शब्द से अलग हो जाता है।

उदाहरण के लिए जमाना शब्द में नुक़्ता का प्रयोग नहीं हुआ है और यहां इसका अर्थ जमा देने से है। ठीक इसके विपरीत अगर हम ज के नुक्ता लगा दें जैसे ज़ और अब इससे किसी शब्द का निर्माण करे जो पहले बताए शब्द की तरह हो, तो उसका अर्थ बदल जाता है। जैसे - ज़माना। अब यहां इस शब्द का अर्थ जमा देने से नहीं बल्कि दुनिया होता है।
इसी तरह विशेष रूप से 5 ऐसे व्यंजन हैं जिन्हें नुक़्ता के आधार पर प्रयोग किया जाता है। ये 5 शब्द हैं
क, ख, ग, ज, और फ है।

 नीचे  कुछ ऐसे ही मिलते जुलते शब्द देख सकते हैं। साथ ही हम ये भी देखेंगे कि इनका गलत प्रयोग करने पर इनके अर्थ में कितना बड़ा अंतर आ जाता है।

आइये देखते हैं नुक़्ता वाले और बिना नुक्ता वाले शब्द । जिन पर स्टार लगा है वो नुक़्ता वाले शब्द हैं ।

ज़माना* - दुनिया
जमाना - ठोस करना
राज़* - रहस्य
राज - शासन
खाना - भोजन
ख़ाना* - जगह
खुदा - खोदने से
ख़ुदा* - परमात्मा
सज़ा* - दंड
सजा - सजावट से
क़मर* - चन्द्रमा
कमर - शरीर का हिस्सा
क़िताब*=कुर्ते आदि का गला
किताब=पुस्तक
ख़सरा*=हिसाब का कच्चा चिट्ठा
खसरा=एक तरह की बीमारी
ग़ुल*=शोर
गुल=फूल
ज़रा*=थोड़ा, कम
जरा=वृद्धावस्था, बुढ़ापा
तेज़*=तीव्र, फुर्तीला
तेज=आभा, दीप्ती, कांति
नुक़्ता*=बिंदु
नुक्ता=सूक्ष्म, बारीक़, ऐब
हैज़ा*=दस्त
हैजा=युद्ध
बाग़*=उपवन
बाग=बागडोर

ऐसे बहुत से शब्द और भी हैं जिनका ग़ज़ल कहते वक़्त तो मालूम नहीं चलता जब उन्हें कलम बध्द किया जाता है तो ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है ।

मिलेंगे किसी और टॉपिक के साथ ।
धन्यवाद
************

नॉट:-
 नुक़्ता हिंदी या देवनागरी या  गुरमुखी और अन्य ब्राह्मी परिवार की लिपियों में भी किसी व्यंजन अक्षर के नीचे लगाए जाने वाले बिंदु को कहते हैं। इस से उस अक्षर का उच्चारण परिवर्तित होकर किसी अन्य व्यंजन का हो जाता है।

जैसे -

'ज' के नीचे नुक्ता लगाने से 'ज़' बन जाता है और 'ड' के नीचे नुक्ता लगाने से 'ड़' बन जाता है।

नुक़्ते ऐसे व्यंजनों को बनाने के लिए प्रयोग होते हैं, जो पहले से मूल लिपि में न हों, जैसे कि 'ढ़' मूल देवनागरी वर्णमाला में नहीं था और न ही यह संस्कृत में पाया जाता है।

नुक़्ता का प्रयोग किन वर्णों में किया जाता है
उर्दू, अरबी, फ़ारसी भाषा से हिंदी भाषा में आए क, ख, ग, ज, फ वर्णों को अलग से बताने के लिए नुक़्ता का प्रयोग किया जाता है क्योंकि नुक़्ता के बिना इन भाषाओं से लिए गए शब्दों को हिंदी में सही से उच्चारित नहीं किया जा सकता। नुक़्ता के प्रयोग से उस वर्ण के उच्चारण पर अधिक दबाव आ जाता है।
जैसे -

हिंदी में 'खुदा' का अर्थ होता है - 'खुदी हुई ज़मीन' और नुक़्ता लग जाने से 'ख़ुदा' का अर्थ 'भगवान्' हो जाता है।

हिंदी में 'गज' का अर्थ होता है - 'हाथी' और नुक़्ता लग जाने से 'गज़' का अर्थ 'नाप' हो जाता है।

कुछ नुक़्ता वाले शब्द
कमज़ोर, तूफ़ान, ज़रूर, इस्तीफ़ा, ज़ुल्म, फ़तवा, मज़दूर, ताज़ा, फ़कीर, फ़रमान, इज़्ज़त आदि।

क, ख, ग में नुक़्ता का प्रयोग हिंदी भाषा में अनिवार्य नहीं है परन्तु ‘ज़’ और ‘फ़’ में नुक़्ता लगाना आवश्यक है।

Tuesday, April 7, 2020

गर्दिश ए ज़िन्दगी ने था बदला मुझे

***

गर्दिश ए ज़िन्दगी ने था बदला मुझे,
लोग कहने लगे नीम पगला मुझे ।
ठोकरों से नया इक हुआ तजरिबा,
हर क़हर रोशनी दे के निकला मुझे ।

------------हर्ष महाजन 'हर्ष'

होंसला ख़ौफ़ खाने लगा है

***
होंसला ख़ौफ़ खाने लगा है,
रुख हवा का बताने लगा है ।
पूछ लेना निकलने से पहले, 
वक़्त यूँ भी डराने लगा है ।

----------हर्ष महाजन 'हर्ष'

Monday, April 6, 2020

शब्द गलत वज़्न में बाँधना


शब्द को अगर गलत वज़्न में ले लिया जाए यानि किसी शब्द का उच्चारण गलत कर लेते हैं तो इससे बहर का दोष पैदा हो जाता है ।
कुछ शब्द जैसे:-
1)अमन-12 शुद्ध,,-अम्न-21
2)तजुर्बा-122,
शुद्ध- तज़रिबा-212
3)तुम्हारा-222
शुद्ध-तु म्हारा-122
4) मोहब्बत-222
शुद्ध- मुहब्बत-122
5)चेहरा-212
शुद्ध-चहरा-22

Tuesday, December 4, 2018

कितनी यादें छिपी हैं उनकी खामोश आंखों में

...

कितनी यादें छिपी हैं उनकी खामोश आंखों में,
डर लगता है कहीं उफ़क न पड़ें मेरे आने से ।

--------------हर्ष महजन

Monday, December 3, 2018

करता रहा उम्र-भर नफरत जिस शख्स से

...

करता रहा उम्र-भर नफरत जिस शख्स से,
जुदा हुआ तो कतरा इक मेरी आँखों में था,

यत्न तो किये थे मैने कि उसे भूल ही जाऊँ, 
मगर क्या करूँ वो दिल की सलाख़ों में था ।

----------------हर्ष महाजन

Tuesday, October 2, 2018

जावेद अख्तर जी

फिल्मी जगत की कुछ कही अनकही बातें ।
***********************************
इस सीरीज में हम बात करेंगे फिल्मी जगत में घटी कुछ ऐसी घटनाओं की जिनकी जानकारी सिर्फ कुछ विरले ही लोगों के पास होगी । औऱ जहां तक उन हस्तियों की बात है जिनके बारे में घटनाओं का ज़िक्र है संभवत: वही होंगे जिनको मैं अभी तलक पसंद करता आया हूँ ।
क्योंकि मैं खुद एक लेखक हूँ ग़ज़ल कविताएं पटकथाएं कहानियां लिखना मेरा शौक है, सो मेरी पहली पसंद जिनके बारे में कुछ अनकही बातें मैं कहना चाहूंगा वो हैं श्री जावेद अख्तर साहब । इनके बारे में कुछ कहने से पहले कुछ और हस्तियों के बारे में बात करना में ज़रूरी समझता हूँ ।
         घटना उन दिनों की है जब हम दसवीं ग्याहरवीं कक्षा नें पढ़ा करते थे । सन था 1970-71 । बहुत से कलाकार फिल्मों में अपनी ऊंचाईयां बना चुके थे और कुछ बनाने में व्यस्त थे । उनमें से एक थे राजेश खन्ना साहब । उन्होंने 1969 से 1971 तक अपने फिल्मी carrier  की सबसे hit फिल्में फिल्मी जगत को दे चुके थे ।
     इसी बीच उन्होंने सुना राजेन्द्र कुमार साहब जो उस वक़्त की बुलंदियों को छू रहे थे अपना बंगला जिसका नाम उन्होंने अपनी बेटी के नाम पर रखा था "डिम्पल" बेच रहे हैं । क्योंकि राजेन्द्र जी अपने नए बंगले में शिफ्ट हो रहे थे ।
****************************************
राजेश खन्ना जी की अपनी फिल्म "हाथी मेरे साथी" में उन्होंने सलीम जावेद की जोड़ी को ब्रेक दिया।
****************************************
राजेश खन्ना जी उस वक़्त में खुद को उस वक़्त के बादशाह समझते थे । इसीलिए उस बंगले को खरीदने की ख़्वाहश रख दी । उस बंगले ने राजेन्द्र कुमार को बुलंदियां दी थी । राजेश खन्ना जी चाहते तो थे मगर कीमत को देख मन बैचैन हो उठा । 
उन्हीं दिनों एक south Indian producer ने एक 'हाथी' पर फ़िल्म offer ki. जिन्हें वो करना तो नहीं चाहते थे मगर उस बंगले को खरीदने के लिए पैसे की ज़रूरत थी । इसी खातिर खन्ना जी नेवो फ़िल्म accept कर ली ।
मगर उस फिल्म की स्क्रिप्ट को लेकर आश्वस्त नहीं थे ।
उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर M A Thirumugam से इस बारे में बात की । अपनी शर्तों पर उस स्टोरी के Screen play writer की तलाश शुरू हुई ।
इसी बीच जावेद औऱ सलीम साहब की खन्ना जी से मुलाकात हुई ।
 but even after some rewrites, the script, involving elephants, didn’t offer anything meaningful to the him up to yet.
       In a bid to get something substantial, Khanna ji asked Salim Khan and Javed Akhtar to take a shot at Haathi Mere Saathi. They both were looking for independent credit too in those days.

Finally खन्ना जी offered them to write it's screenplay. उन्होंने कहा अगर उनको उनका स्क्रीनप्ले अच्छा लगा तो वो ओरों से ज़्यादा पैसा और शौहरत देंगे ।
फ़िल्म का original नाम "प्यार की दुनियाँ" से बदल कर "हाथी मेरे साथी" रखा गया, और ये फ़िल्म सुपर हिट हुई । इसी फिल्म से जावेद-सलीम की जोड़ी को ब्रेक मिला ।

****