Friday, March 27, 2015

तुझको देख यहाँ हँस रहा हूँ ज़रू

नज़्म
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तुझको देख यहाँ.........हँस रहा हूँ ज़रूर,
तुझपे मरता हूँ.......ये न समझना हजूर |
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मैं हूँ खुदगर्ज़ भी........मतलबी भी बहुत,
इल्तिजा अर्थी संग.....मेरी चलना ज़रूर |
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रूह सिजदा किये........रात-दिन अब तेरा,
पर करूँ नित नए......करम होके मजबूर |
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अब समंदर की कब से........तलाश मुझे,
कर दो मिटटी दे दो......चार काँधे हजूर |
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मैं भटकता हूँ सदियों से.........संसार में,
अब तजूं जग मैं तेरा तो मिलना ज़रूर |
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________हर्ष महाजन