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Saturday, December 18, 2021

समय का पहिया जब भी चलेगा,

समय का पहिया जब भी चलेगा, कुदरत का इंसाफ चले,
जब भी चले इंसान का पहिया  चारो तरफ बेईमान चले ।

माफ करो भैया, काल चक्र भैया 

दिल से दिल की बात सुने तो हर कोशिश में ताकत है,
जब भी चले ढफली अपनी तो हर जगह तूफान चले ।

माफ करो भैया, काल चक्र भैया 

साथ रहें दुश्मन बनकर अर मौत पे अश्क़ बहाते है,
अपनों संग अना से अकड़ा रहा आखिर इकला जजमान चले ।

माफ करो भैया, काल चक्र भैया 

हर्ष महाजन 'हर्ष'

Sunday, May 10, 2020

यादों का दीप जला ये दिल में दर्द उठा

***


यादों का दीप जला  ये दिल में दर्द उठा
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

तेरे हाथों की महक म अब भी आती है सदा,
तेरे मुखड़े की झलक , आये सपनों में सदा,
न छिनना ये सिलसिला, मिले है सकून बड़ा,
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

बचपन के दिन वो मेरे, जो बीते संग माँ तेरे,
थे दिन तेरे गीतों भरे बसे जो अंग अंग नेरे,
न भूलूँ उनको सदा है उनमें जादू भरा
बड़ी मुद्दत से मुझे माँ तेरा आँचल न मिला |

यादों का दीप जला..........

***
written in 1980's

Monday, August 10, 2015

जहाँ दर्द चले मद्धम-मद्दम ( गीत )


गीत
.
जहाँ दर्द चले मद्धम-मद्दम, वहां दिल में उमंग भी लंबा रे,
जहाँ हुस्न हुआ बेकल-बेकल, वहां प्यार का रंग भी मंदा रे |
.
जब रात हो कटती गरमी में, बरसात में भी बरसात नहीं,
सब वादे वहां फिर दफ्न हुए, हुआ मौसम इश्क का गंदा रे |
.

जहाँ फूल खिलें गुलशन-गुलशन, पतझड़ का फिर वहां काम है क्या ,
जहाँ कलियाँ डाल से झरने लगें, माली का उस पर फंदा रे |
.

इस शहर की शानो शौकत में, अब इश्क भी नामुमकिन सा हुआ,
हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, रंगरलियों का अब ये धंधा रे |
.

कभी सूली पर ईमान चढ़ा, कभी फंदा नफरत का था चढ़ा,
पर झूठा सच्चा जो भी चढ़ा, हर बार खुदा का ही बंदा रे |

हर्ष महाजन

Sunday, May 10, 2015

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ

आदाब !!!!
क्या कहूँ आज मदर्स डे है !!! सो सो नमन माँ को !! बड़े खुश नसीब हैं वो सभी शख्स जिन्हें उनका साथ नसीब है | न जाने क्यूँ ये दिन ,किस ने और क्यूँ बनाया | मेरे लिए तो ये दिन ज़ह्नीय दर्द लेकर उभर कर आता है | सच में माँ का कोई सानी नहीं | हर इस दिन को मेरा मन पता नहीं कितने भावों को जन्म देता है और न जाने कितने भाव कुकरमुत्तों की तरह इस ज़हन में दफ़न हो जाते हैं | कुछ भाव तो जुबां पर आकर वापिस अपने ख्वाब-गाह में पहुँच जाते हैं.....शायद वो मेरी कलम जब शांत होगी तो बाद में पटल पर आयें.......हे माँ ..मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं ...???


गीत 

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ ,
दे दे तू अब अवतार कभी,
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............

जो ज्योत जली थी तुझसे माँ,
दुनियावी भी लगे रिश्ता गया |
ये लाल तेरे सब भटके हैं........2
तू दिखा अपना माँ द्वार कभी ।......2
हो सके तो आ, सुलझा दे माँ
उलझे सब दिलों के जाल सभी |
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............ 


मन-मन जोड़े थे, तूने माँ,
वो प्यार की वर्षा अब कहाँ गई
हम पापी जुल्मी सब ही तो थे,
फिर भी सहे तूने खार सभी..........2
अब तरस गए तेरे दरस को माँ 

तू दिखा दे अक्स का हाल कभी
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ............ 

माँ तेरी नाव ही थी अपनी ,
अपनी पतवार तो थी ही नहीं,
अब अश्क रहें, अखियन में सदा,
दामन में जो ले, गमख्वार नहीं ।.....2
जब से छोड़ा तूने द्वार यहाँ ,
हासिल का कोई रखवाल नहीं |
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी ......2


मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ.......

मुद्दत से तुझे देखा ही नहीं माँ,
दे दे तू अब अवतार कभी,
ये दुनिया अजब निराली है,
बिछड़े यहाँ तेरे लाल सभी .....2
मुद्दत से तुझे देखा ............


___हर्ष महाजन


हैप्पी मदर्स डे

:( :( :(

Monday, September 22, 2014

ऐसी कोई संघ देखी नहीं जिसे नेता खुद बर्बाद करें




...
बैंक कर्मर्चारियों की त्रासदी
ऐसी कोई संघ देखी नहीं जिसे......नेता खुद बर्बाद करें,
इतिहास के पन्नों पर लिखें......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
.
दसवें वेतन मान पे देखो............दो-दो वर्ष संवाद चले ,
रहे बन मोनी बाबा वो जन-जन फिर भी थे साथ चले |
भूल गए अब सहनशीलता......खुद की पारी नाबाद करें ,
इतिहास के पन्नों पर लिखें......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
.
सिंहासन जब हिलने लगे ....नेता गण सब अवसाद करें,
छोड़ के वेतन सरकारी वो.....द्विपक्षी की बस बात करें |
कोई उठे जन करें ट्रान्सफर मिलकर सब फिर घात करें ,
इतिहास के पन्नों पर लिखें.......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
.
आओ साथियो मैदानों में.....भर दो कण-कण खाली जो,
जोशीले नारों से हिला दो.........भ्रष्टाचार के सवाली जो |
कह दो इन्हें अब छोड़ें जिद्द यूँ....वेतन पर न बवाल करें ,
इतिहास के पन्नों पर लिखें.......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
.
हाथ में चूड़ी पहन के अब तुम वक्त का न इंतज़ार करो,
उठो जंग में संग चलो.........हर जन वेतन की बात करो |
मिले जो नेता टूट पड़ो जो.......वेतन के इलावा बात करे,
इतिहास के पन्नों पर लिखें.......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
.
ऐसी कोई संघ देखी नहीं जिसे.......नेता खुद बर्बाद करें,
इतिहास के पन्नों पर लिखें.......ज्यूँ फांसी जल्लाद करे |
__________________हर्ष महाजन

Saturday, May 4, 2013

आज की हसीनों से दामन छुडाएं कैसे हम

...

__________एक गीत

आज की हसीनों से दामन छुडाएं कैसे हम,
झील सी आँखों में यूँ, डूब गए हों जैसे हम |

जुबां भी अब खामोश औ ये आँखें भी हुईं हैं नम,
दिल में हैं ज़ख्म बहुत भरेंगे कैसे-कैसे हम |

ये भीगी-भीगी पलकें हैं जो यादें उनकी झेलती,
तन्हा-शब्-ओ-तन्हा-गम झेलें कैसे-कैसे हम |

टुकड़ों में अब किया कतल बदल गए कातिल कई,
इन वक़्त की राहों को अब बदलें ऐसे-कैसे हम |

ये मेरी बदनसीबी कि न समझे वो न समझे हम,
यूँ रिश्तों पे पडा कफ़न ये भूलें ऐसे-कैसे हम |

____________________हर्ष महाजन |

Tuesday, January 15, 2013

तेरे हुस्न-ओ-रुआब में कशिश इतनी

_______एक गीत

तेरे हुस्न-ओ-रुआब में कशिश इतनी,
कि डर कर तुझसे मुहब्बत ही न की |

मेरा रोम-रोम तुझे चाहे बहुत
पर मिलने की कभी जहमत ही न की |

जब किया था करम तूने हम पर
थी तपिश बहुत हिम्मत ही न की |

ऐसी ग़ज़ल नहीं, जहां न ज़िक्र तेरा
मेरी कलम ने कभी जुर्रत ही न की |

_________हर्ष महाजन

Saturday, October 27, 2012

मेरी ईद मुबारक तुम ले लो सनम,

ईद के इस त्योहार पर सभी दोस्तों को ईद-मुबारक,,ईद-मुबारक,ईद-मुबारक
आओ सभी इस मौके पर इक गीत गुनगुनाएं..............

....

मेरी ईद मुबारक तुम ले लो सनम,

फिर ये चंदा फलक से उतर जाएगा |
ये तो अम्नों अमां का है मेला यहाँ,
जल्द मिल लें नहीं तो बिखर जाएगा |
मेरी ईद मुबारक ...................

रंजिश भी रहे न रहे रंज-ओ-गम

ये खिजाँ सा चमन था वो खिल जाएगा |
कोई ज़ुल्म-ओ-सितम की फिकर न करो
ये जो बिछड़ा था अल्लाह अब मिल जाएगा |
मेरी ईद मुबारक ...................

अब मिटा दो ये नफरत के शोले सभी,

नहीं तो दिल का गुलिस्ताँ उजड़ जाएगा |
ये तो अम्नों अमां की ये ईद है आज,
आओ मिसाल-ए-मुहब्बत निकल जाएगा |
मेरी ईद मुबारक ...................

_________________हर्ष महाजन

Friday, October 5, 2012

मैं खुली हुई किताब हूँ

...

मैं खुली हुई किताब हूँ,
नफरत में आफताब हूँ |
गर बोलता नहीं हूँ मैं ,
पर सब्र का माहताब हूँ |

साँसों की डोर कब तलक,
जब तक रिश्तों की ताब हूँ |
चलता है कौन उम्र-भर ,
मैं फिर तिलस्मी ख्वाब हूँ |

उनकी जुबां में दर्द था,
मैं खुद भी इंतेखाब हूँ |
जो टूट गया वो दिल था
मैं उसका ही जवाब हूँ |

आँखों में उतरे ख्वाब यूँ, 
देखें मुझे ज्युं नवाब हूँ |
उल्फत से भागता फिरूँ,
वो कहे कि तेरा शबाब हूँ |

पलकों से गिरती बूंदों में,
ज़ख्मों का इक हिसाब हूँ|
मैं खुद नशा नसीब का ,
साकी भी खुद शराब हूँ |

______हर्ष महाजन

Friday, September 14, 2012

मुझे अनजान मत समझो मेरी पहचान रहने दो

एक गीत हिन्दी दिवस पर........अप सभी साहित्यक कवियों के हवाले .......
हिंदी दिवस पर सभी को शुभ-कामनाएं...
_______________________________

मुझे अनजान मत समझो मेरी पहचान रहने दो,
मैं हूँ आसान संग रक्खो ये इक एहसान रहने दो |
मैं बिंदी हूँ इस भारत की किताबों में तो रहने दो,
मैं हिन्दुस्तान की भाषा हूँ हिन्दुस्तान में रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ..................

मैं नत-मस्तक हूँ जयसिंह की इक पहचान दिया उसने
ये भाषा लाखों में चुन कर मुझे हिंद्दुस्तान दिया उसने |
मेरे माथे पे लगा बिंदी का इक अहसान रहने दो ,
करोड़ों हाथों में यूँ सौंप मेरा इनाम रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

मुझे छंदों में तुम बदलो मुझे दोहों में भी चख लो
मुझे ग़ज़लों से भी तोलो मुझे संगीत में रख लो |
मैं हूँ गागर में सागर अब मुझे नदिया सा बहने दो,
मुझे हक है मुझे भारत की सही पहचान रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

मुझे अंग्रेजो ने कमतर मुझे अपनों ने मारा है
उठी लाठी से फिर भी मैं देखा घुटनों तक गारा है |
मिले इंसान कुछ ऐसे इसे मात्रभाषा कहने दो
अब हिन्दुस्तान की जग में यही पहचान रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

यहाँ नेता हैं कुछ ऐसे हिंदी का विकास लायेंगे
हिंदी को अंग्रेज़ी में लिख कर हिंदी दिवस मनाएंगे |
उनके अंग्रेजी के भाषण कोई कहे उनको रहने दो
हिंदी को हिंदी दिवस पे तो सहित्यक मंच तक रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

____________________हर्ष महाजन

Saturday, August 4, 2012

मेरे दिल की बातें जो कागज़ पे थीं

_________एक गीत

मेरे दिल की बातें जो कागज़ पे थीं, 
दर्द-ए-दिल में असुअन से खाए नमीं ।
गम-ए-फुर्कत से न निकले कोई हल,
जब तक न बनेगी कोई दिल पे ज़मीं ।
मेरे दिल की बातें ............

मुझको मालूम है तू होगा फनां,
मेरे बिना तुझको भी जानां कहाँ ।
शिकायतें तो तुझको ज़माने से थीं, 
जाने फिर क्यूँ ढूंढें है मुझमें कमीं । 
मेरे दिल की बातें..........
 
अब तो लुत्फ़-ए-ज़न्नत गली में तेरी,
दिल में कलियाँ खिल गयीं अब मेरी ।
बुलंदी पे तारों की छाँव घनीं,
पाँव नीचे होगी कोई ज़मीं ।
मेरे दिल की बातें..........

मैं हक पे हूँ तो गम है किस बात का,
मुखालिफ ये दुनियाँ तो डर भी है क्या ।
रूह मेरी कातिल तिरे गम में सनीं,
खुदा के लिए अब तू कर ले यकीं ।
मेरे दिल की बातें..........
 

__________हर्ष महाजन


*************
गम-ए-फुर्कत=जुदाई
*************

Tuesday, June 19, 2012

Ek Geet----मेरे साए की है छाँव

Ek Geet

मेरे साए की है छाँव,
सर पे धूप नीचे पाँव,
धरती पे है झूठा बसेरा
फिर गगन करे शामिल अँधेरा ।
रात ख्वाबों में कट जाती,
दिन में यादें फिर रुलाती,
बादलों में है बरखा का डेरा,
चंद अश्कों ने आके मुझे छेड़ा ।
मेरे साए की......

___हर्ष महाजन

Wednesday, May 9, 2012

माँ तुझको देखा ही नहीं

..

__________माँ

माँ तुझको देखा ही नहीं
तू दे अपना अवतार कभी
ये दुनिया अजब निराली है
करती न मुझे क्यूँ प्यार कभी --------------2

न मिलता पिता का प्यार मुझे
न मिले दुनिया का दुलार मुझे
संग ले जा मुझको तू अपने
या सपनों में दे आकार कभी ।

यूँ पल-पल टूटे दिल अपना
क्यूँ दिल की कीमत कुछ भी नहीं ,
क्या भूखे बिलखते मर जाएँ
क्यूँ खुले
न किसी का द्वार कभी ।-------------2

बस ज़ुल्मों की बरखा सहते हम,
अपनी कोई पतवार नहीं,
यूँ अश्क बहें अखियन से सदा
दामन में जो ले गमख्वार नहीं ।--------------२

माँ तुझको देखा ही नहीं
तू दे अपना अवतार कभी

________हर्ष महाजन ।


+++++++++++++++

मेरी किताब से 2005

Sunday, May 6, 2012

इस तरह न किसी पे हंसा कीजिये


_________गीत

इस तरह न किसी पे  हंसा कीजिये,
जो भी हो हर किसी से वफ़ा कीजिये ।
चूड़ियाँ भी रहें अब सलामत तेरी,
ज़िन्दगी भर इसी की दुआ कीजिये ।

करते थे वो वफ़ा जो रहे हमसफ़र,
डंके की चोट पर हम देते थे खबर ।
गर हुए बे-वफ़ा वो तो क्या कीजिये
फिर मेरे दर्द-ए-दिल की दवा कीजिये ।

मुझको जीना यूँ ख़्वाबों में आता नहीं
फिर दबे पाँव आना मुझे आता नहीं,
अब हकीकत की दुनिया जिया कीजिये,
और ख़्वाबों से खुद को रिहा कीजिये ।

अब तुझे छोड़ कर मैं कहाँ जाऊं 'हर्ष'
तुझ तक आना ही मेरी ये ज़िन्द थी संघर्ष,
अब तुम कह दो मुझे झक मारा कीजिये
दिल किसी  और पे आये क्या कीजिये ।

इस तरह न किसी पे  हंसा कीजिये,
जो भी हो हर किसी से वफ़ा कीजिये ।


_____________हर्ष महाजन ।




Saturday, May 5, 2012

मैं तो तन्हाईयों का तलबगार हूँ

..

मैं तो  तन्हाईयों का तलबगार हूँ 
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

था काफिर सनम वो जुदा क्या हुआ
गर हुआ भी जुदा तो जुदा क्या हुआ।
या खुदा क्या कहूं उसका ही प्यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

हम क्या हैं हमारी औकात है क्या ,
जो भी है 'हर्ष' का, है उसी का दिया ,
उसके गाँव औ शहर का मैं बीमार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

अब ज़बीं पर भी सजदा उसी का रहे
गर मुमकिन नहीं ये तो ज़िन्द न रहे,
सर कलम भी करे और कहे यार हूँ
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।

मस्जिदों में अजाँ मंदिरों में शंख-नाँ(शंख-नाद)
किस तरह पत्थरों में भरी उसने जाँ,
वो कहे मुझ में, मैं उसका अवतार हूँ ,
मैं फ़क़त यार उसका फ़क़त यार हूँ ।


____________हर्ष महाजन ।



ज़बीं=मस्तक

Friday, April 13, 2012

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं

..

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

कली-कली हर ड़ाल  पर लिखा 'बोस' 'भगत',आज़ाद यहाँ,
माता गंगा, जमुना विचरित, अजूबा  विश्व का ताज यहाँ ।
भारत देश आज़ाद है जब से कोई दुश्मन यहाँ ठहरा नहीं,
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।
ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

कभी हुआ परिवेश राम का कभी कृष्ण अवतार हुआ
कभी हुआ महाभारत का जंग कभी कंस संहार हुआ ।
ऐसी रामायण, ग्रन्थ न गीता ऐसा कोई रंग गहरा नहीं ,
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

जम्मू और कश्मीर की खातिर कितनी कोखें उजड़ गयीं,
वीर भगत सिंह सुखदेव जैसे रोज़ जनम यहाँ लेते नहीं ।
ऐसा हिन्दू ,सिख न मुस्लिम ऐसा कोई रिश्ता गहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

ऐसा किला, पहाड़ न नदिया, ऐसा कोई अब सहरा नहीं
जहां हिंद का परचम अब तक तीन रंग में लहरा नहीं ।

________________हर्ष महाजन ।

Wednesday, April 11, 2012

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ
महेनत से जोड़-जोड़  कमाई है रोटियाँ

धुप में झुलसता था फिर काम के बिना
भूखी जो देखी नज़रें तो छुपाई है रोटियाँ |


मजदूर बन के ढोये थे मलबे की गोटियाँ
फिर शाम को अदब से फिर खाते थे रोटियाँ

घर आ नहीं सका था मैं त्योहारों में कभी
दिल मार , खा रहा था बासी मैं रोटियाँ ।

सड़कों पे खा रहा था सिपाही की सोटियाँ
मैं इस तरह कमा रहा दो जून की रोटियाँ ।

दर-दर भटक-भटक के जुटाई हैं रोटियाँ
महेनत से जोड़-जोड़  कमाई है रोटियाँ

____________हर्ष महाजन

Friday, March 9, 2012

ज़ुल्फ़ बिखरेगी तो बरखा भी वहाँ बरसेगी

ज़ुल्फ़ बिखरेगी तो बरखा भी वहाँ बरसेगी
फिर सितारों की ये महफ़िल भी वहां पसरेगी ।

जिस तरह तेरी मोहब्बत का वो दम भरते हैं,
है यकीं मुझको ज़फायें भी वहाँ तरसेंगी ।

होंगे शायद तेरी चाहत में हज़ारों काबिल
पर न होगा मेरी तरह नज़र तो परखेगी ।

_______________हर्ष महाजन 

Sunday, August 21, 2011

युग-युग से पीड़ित देश को यारो "हर्ष " का ये नारा है

युग-युग से पीड़ित देश को यारो "हर्ष " का ये नारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |

हिंदू मुस्लिम सीख ईसाई सभी है इसमें झूझ रहे
गुमराह हो गयी निति व्यवस्था घोटालों में डूब रहे
निर्बल जनता पर भ्रष्टाचारी निरंकुश अत्याचार करें
रिश्वत बिन कोई काम नहीं न दो तो व्यभिचार करें |
जाग उठो ऐ भारतवासियों,संविधान ही इक सहारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |


युग-युग से पीड़ित देश को यारो "हर्ष " का ये नारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |

सूझ-भूझ और छल कपट ने संसद को अब यूँ घेरा है
लालू, अमर सिंह सरीके जैसे समिति का अब भेडा है
सारा हिन्दुस्तान देख रहा, सरकार ने अब क्या ठानी है
न समझो निर्बल जनता को अभी जोश इसमें तूफानी है
जाग उठो हो गया सवेरा भ्रष्टाचार नहीं गंवारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |

युग-युग से पीड़ित देश को यारो "हर्ष " का ये नारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |

भूली नहीं आजादी हमको सुभाष बोस बलिदानी था
सुखदेव भगत और राजगुरु की याद हमें कुर्बानी का
उनकी दी आजादी हमने संविधान से ही चलाना है
अन्ना के जन-लोकपाल को इसलिए तो लाना है |
जाग उठो और पकड़ो मशालें हिन्दुस्तान हमारा है |
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |


युग-युग से पीड़ित देश को यारो "हर्ष " का ये नारा है
"चलो दिल्ली चलो दिल्ली" हमें अन्ना ने पुकारा है |

Sunday, April 26, 2009


-Aadmi ko chaahiye,apne liye do gaz zameeN,
Jaane phir kyuN doondta hai bewajeh dheroN zameeN.

Kaun jaane Zindagi ka ye diya kab tak jale,
Khud hi gamoN ki baad meiN behne lagi apni zameeN.

Banke meethe shabd bheduN kyuN kisi ka dil abas,
Sabka apna aasmaN hai, sabki apni hai zameeN.

Dekh kar aaina khud se bharosa uth gaya,
Beshak khuda se mangta hai ‘harash' ab do gaz zameeN.


~~~~*Harash*~~~~