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Thursday, May 7, 2015

चुगली निकल ज़ुबान से, अदभुत खेल दिखाय





...

चुगली
चुगली निकल ज़ुबान से, अदभुत खेल दिखाय,
रिश्तों में इंसान के, तुरत फेर पड़ जाय |
तुरत फेर पड़ जाए, करावे जंग दुतरफे,
सब भुजंग बन जांय , जु इक-इक जां को तरसे,
कहे 'हर्ष' दो पलट, चुगल-खोरों की गुगली,
इक-इक करके पकड़, झटक दो करे जु चुगली||
हर्ष महाजन



कुण्डलिया छंद
पुराणी कृति






Sunday, March 23, 2014

मोदी हिन्द की आन का, एकहू ही फरमान

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मोदी हिन्द की आन का, एकहू ही फरमान,
जनता हिंदुस्तान की, कस रही अब कमान ।
कस रही अब कमान,..फिर भ्रष्टाचार घटेगा ,
खिलेगा फूल कमल..... यहां से हाथ घटेगा ।
कहे 'हर्ष' दो बदल,.....मोनि बाबा की गोदी ,
हाथ में ले लो कमल,.. तभी आएगा मोदी ।

____________हर्ष महाजन

Monday, August 12, 2013

गद्दारों के देश में अब, खुद ही सब अवतार

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गद्दारों के देश में अब, खुद ही सब अवतार,
फौजी दस्ते लूटकर ,जहाँ बने सरकार |
जहाँ बने सरकार , साजिशें रोज़ बनायें,
भोली सी आवाम , सहे आतंकी सजाएं |
कहे ‘हर्ष’ दो पलट, देश के सभी खुद्दारों,
उठाओ जंगी तोप, दाग बोल के गद्दारों |

______________हर्ष महाजन

Sunday, June 2, 2013

कुण्डलिया छंद


कुण्डलिया छंद

कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|

दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान||
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक|
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक|
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया|
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया||

__________ NAVIN C. CHATURVEDI


कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित

कुण्डलिया है जादुई
2112 2 212 = 13 मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|
21 21 212 = 11 मात्रा / अंत में गुरु लघु
दोहा रोला का मिलन
22 22 2 111 = 13 मात्रा / अंत में लघु लघु लघु [प्रभाव लघु गुरु] के साथ यति
इसकी है पहिचान||
112 2 1121 = 11 मात्रा / अंत में गुरु लघु
इसकी है पहिचान,
112 2 1121 = 11 मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
मानते साहित सर्जक|
212 211 211 = 13 मात्रा
आदि-अंत सम-शब्द,
21 21 11 21 = 11 मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
साथ, बनता ये सार्थक|
21 112 2 211 = 13 मात्रा
लल्ला चाहे और
11 22 21 = 11 मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
चाहती इसको ललिया|
212 112 112 = 13 मात्रा
सब का है सिरमौर
11 2 2 1121 = 11 मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
छन्द प्यारे कुण्डलिया||
21 22 2112= 13 मात्रा

साभार

हर्ष महाजन

Saturday, April 6, 2013

कर्जा अपनी जात से बनावे इक मिसाल

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कर्जा अपनी जात से बनावे इक मिसाल,
एक से ले दूजे को दे कहलाए उ दलाल |
कहलाए उ दलाल, बनावे मूरख सबको,
मित्र जल्द बनाये, समझ महामूरख उनको |
कहे 'हर्ष' कविराय, जहाँ में लोग हर दर्जा,
कुछ जीयें खुद से, जीयें कुछ ले के कर्जा |

___________हर्ष महाजन

Wednesday, March 27, 2013

होली अपनी शान में, रंग से करे कमाल

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होली अपनी शान में, रंग से करे कमाल,
खुशियों के रंग संग मिलें,फिर हो जाए धमाल |
फिर हो जाए धमाल,बने हैं सब हमजोली ,
नशे में पत्नि-चुन्नु, अब मुन्नू की होली |
कहे 'हर्ष' कविराए , सभी 'दोस्तों की टोली',
बुरा न मानो आज , ख़ुशी से खेलो होली |

________________हर्ष महाजन

Tuesday, March 26, 2013

रंग सभी फीके पड़े, सिर्फ चढ़े रंग गुलाल

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रंग सभी फीके पड़े, सिर्फ चढ़े रंग गुलाल,
इक दूजे के मिल गले ,कर होली का ख्याल |
कर होली का ख्याल,ये टोली दोस्तन की है,
पीलो घोल के भंग, चाहो तो बोतल भी है
कहे 'हर्ष दो पलट, उन्ही की ज़िन्द जो बेरंग
होली है यु भाई, टका टक रंग दो सब रंग |

_______________हर्ष महाजन

होली है है भाई होली ........

Monday, March 25, 2013

कुत्ते बने अब मनचले,बिल्ले गए परदेस

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कुत्ते बने अब मनचले,बिल्ले गए परदेस,
बंदर सब रंग ले उड़े,लगायें जंगल में रेस |

लगायें जंगल में रेस,मची शेरो में भगदड़,

देख रंगों की झिलमिल ,फिर बने सब गीदड़ |
कहे "हर्ष" तुम खेलो, नहीं तो पड़ेंगे जूते,
सभी लगाओ पशु रंग, न बन जाओं तुम कुत्ते |

_____________हर्ष महाजन

~~~~~~~~~~~~~बुरा न मानों होली है ~~~~~~~~~

Friday, April 13, 2012

रोटि-रोटि कहने लगा, भिखू घर के बाहर

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रोटि-रोटि कहने लगा, भिखू घर के बाहर
पर रोटि उसको न मिली,महंगा हुआ ज्वार।
महंगा हुआ ज्वार ,घर आया वापिस जायि ,
घर पर उसे खिलावे, तो खुद भूखा रह जायि,
कहे 'हर्ष' लो समझ, यहाँ इक बात है मोटी,
घर आया भुखा जाए न,बिना दाल और रोटी ।

__________________हर्ष महाजन

रोटी निकल रसोइ से, सबकी भूख मिटाए

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रोटी निकल रसोइ से, सबकी भूख मिटाए,
अमीर गरीब कु एक सा, समझ पेट में जाए ।
समझ पेट में जाए, सभी का एक सा दाना
भूखा न रह पाये, पड़े यु रोज़ ही खाना ,
कहे 'हर्ष' कविराय , सलाम इसे कोटि-कोटि,
बिन मेहनत जु खाए , झटक तू उसकी रोटी ।


___________________हर्ष महाजन

Thursday, March 29, 2012

बुज़ुर्ग किया न भूलियो, चल लाठी संग साथ

हर्ष महाजंस सिक्स लायीनार्स
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बुज़ुर्ग किया न भूलियो, चल लाठी संग साथ 
दुःख में उनको झेलियों, फ़र्ज़ निभा दिन-रात ।
फ़र्ज़ निभा दिन-रात, श्रवण के भाँती लीजो  ,
क़र्ज़ दूध का जान, उन्हें कुछ कमी न दीजो ।
कहे 'हर्ष' समुझाए, अपने कु करदे सुपुर्द,
उसी डगर गुजरना,  जब होवेगा तु बुज़ुर्ग ।

___________________हर्ष महाजन ।

Tuesday, March 27, 2012

अपने घर को छोड़ के, चली पराये गाँव

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अपने घर को छोड़ के, चली पराये गाँव
काट दियो उसि डाल को,डाल तले जिस छाँव।
डाल तले जिस छाँव, सजन संग दूजे लागी,
वो नार बनी भुजंग, देख पर नार वो जागी ।
कहे 'हर्ष' समुझाए , न संजोयें ऐसे सपने,
पल में झटके जाएँ, रहें जु कभी थे अपने ।

__________________हर्ष महाजन

पतनी अपनी जात की, एकहू तरकश बाण

पतनी अपनी जात की, एकहू तरकश बाण
मियाँ जी के अगल-बगल, तनी जु तीर-कमान ।
तनी जु तीर-कमान, यु सौतन कैसे आवे
पति होए बेइमान, तो घर कु सर पे उठावे ।
कहें 'हर्ष' कविराय , घरां की खाओ चटनी
सौतन की न सोच, जब हो घर में जु पतनी ।


____________________हर्ष महाजन

Monday, March 26, 2012

जंग चलावे जबहु कभी, घर पर पहिला वार

आजकल के सन्दर्भ में उपयुक्त मेरा एक six liners ...जब किसी इंसान की मति मारी जाती है तो उसके घर को उजाड़ने के लिए बाहरी तत्त्व अपने कार्य को सिद्ध करने के लिए या यूँ कहें की अपना उल्लू सीदा करने के लिए उस का आँगन इस्तेमाल करते हैं ... और उस इंसान को तब पता चलता है..जब सब कुछ ख़तम हो जाता है ..।
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एक और पुरानी रचना ....हर्ष महाजन' स सिक्स लायीनर्स ....

जंग चलावे जबहु कभी, घर पर पहिला वार,
घायल जब समझे रहा , खुनी भयी तलवार।
खुनी भयी तलवार, कटे सब अपने भायी,
हरसुं छपी अखबार, भायी कु समझ न आयी ।
कहे 'हर्ष' समुझाए , सबहूँ को राखियो संग,
कबहुं जीत न पायी, चलायी के ऐसी जंग ।

_______________हर्ष महाजन

दुश्मन-दुश्मन कही के, दुश्मन लियो बनाई

दुश्मन-दुश्मन कही के, दुश्मन लियो बनाई ,
ऐसा दुश्मन बन गयो, दोस्त बने अब नाहि।
दोस्त बने अब नाहि, गले का बन गयो फंदा,
देवे गरदन काटि , मिले दुश्मन का जु बन्दा ।
कहे 'हर्ष' समुझाए, मिलिये हैं कम हू सज्जन,
बना के अच्छे दोस्त, कबहू समझो न दुश्मन ।


______________हर्ष महाजन 

चोर-चोर कहने लगा खुद ही घर का चोर

एक और पुरानी रचना ....हर्ष महाजन' स सिक्स लायीनर्स  ....

चोर-चोर कहने लगा खुद ही घर का चोर,
बस्ती सारी जगाये ली मचा-मचा के शोर
मचा-मचा के शोर, बहुतेरे नाम सुझाए
रंगत उसकी देख,किसी के समझ न आये,
कहे 'हर्ष' कविराय, यु है अपराध घनघोर,
ऐसे घरां से बच , जिनहाँ के घर में चोर।

__________________हर्ष महाजन  

Wednesday, March 14, 2012

लेने उनसे मैं चला आज की शाम उधार

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लेने उनसे मैं चला आज की शाम उधार
रोम-रोम था डूब रहा  चारों और श्रृंगार ।
चारों और श्रृंगार, घटायें काली छायीं ,
रस में डूबा प्यार बदरिया खूब थी आयी,
कहे 'हर्ष' अब करो  दिलों के लेने देने,
ढल जायेगी प्रीत  पड़ेगा पतझड़ लेने ।

______________हर्ष महाजन

सास बहू से कह चली चल पीपल की छाँव

सास बहू से कह चली चल पीपल की छाँव
सर पे रख के घाघरी पटक चली फिर पाँव ।
पटक चली फिर पाँव मुखडिया हो गयी लाल,
बहू कहे तू निकल  मैं अबकि चली ससुराल।
कहे 'हर्ष' समुझाए, बहू को बात इक ख़ास ,
पता चलेगा दरद,  कि जब तू बनेगी सास ।

__________________हर्ष महाजन

Thursday, March 8, 2012

दिल पे रंग उसका चढ़े , न चढ़े अब दूजा रंग

राधास्वामी जी


दिल पे रंग उसका चढ़े , न चढ़े अब दूजा रंग
होली है रंग प्यार का , बाकि रंग सब बदरंग ।
बाकि रंग सब बदरंग , ये मन के रंग अलग हैं
भर इन्हें अब ज़िन्द में, पड़े जो अलग थलग हैं ।
कहे 'हर्ष' तू समझ, ये रंगों की अब झिलमिल ,
न रंग दिल होली से ,खुदा के रंग से रंग दिल ।


_________________हर्ष महाजन

'हर्षा' सब के मन खड़ा काटे सबका ज़हर

'हर्षा' सब के मन खड़ा काटे सबका ज़हर 
 मनवा काले सींच कर शब् में भर दे सहर ।
शब् में भर दे सहर, करे अब दूर छलावे ,
दिल में हो कुछ बैर , सभी को दूर भगावे ,
कहे 'हर्ष' कविराय , खुदा से कर दो वर्षा ,
बैर करेगी हरण , तो खुश होवेगा हर्षा ।

हर्ष महाजन
०४/०३/२०१२