Tuesday, April 22, 2014

क्या उदास नगमों का राज़ था टुकड़ों में दिल का साज़ था


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क्या उदास नगमों का राज़ था, टुकड़ों में दिल का साज़ था,
मैं हैरान हूँ इस बात पर मेरे दिल पे किस का राज़ था।
मैं हूँ झौंका इश्की बहार का, मुझे इल्म न था इज़हार का,
मेरे ज़ख्म ज़िसने हरे किये, मेरे दिल का वो हमराज़ था ।

----------------हर्ष महाजन