Thursday, May 21, 2015

कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए

नज़्म
कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए,
हमें ईजाद करना है कलाम-ए-इश्क चले आइये |
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तुझे बस देखकर लफ्ज़ी तलाफुज़ भूल जाता हूँ ,
अहसासों की शहादत हो रही अब तो चले आइये |
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दर्द इतना है दिल में आज फिर भी मैं दुआ दूंगा,
यकीं मुझको है ढूँढोगे कलम इस बार चले आइये |
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अगर साँसों की कीमत पर गए कुछ लोग मिल जाएँ,
मिलेगा लुत्फ़ तभी जब लोग वो कह दें चले आइये |
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ये नफरत कितनी भी ऊंची सख्त-जाँ हो मगर फिर भी,
मुहब्बतों के सभी रस्ते दिलों से हैं चले आइये |



__________हर्ष महाजन


Wednesday, May 20, 2015

कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए


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कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए,
हमें ईजाद करना है कलाम-ए-इश्क चले आइये |

___________हर्ष महाजन

Tuesday, May 19, 2015

रहम कर रहम कर रहम शेरां वाली

!! जय माता दी !! 

माँ शेराँ वाली
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रहम कर रहम कर रहम शेरां वाली,
इधर कर निगाह-ए-करम शेरां वाली |

न छोड़ेंगे हम माँ ये दामन तुम्हारा,------ 3
जहां में बचा है बस तेरा सहारा
दे अपने चरण की शरण शेरां वाली ,
इधर कर निगाह-ए-करम शेरां वाली |

रहम कर रहम कर रहम शेरां वाली ...

मैं आया हूँ तेरे दर पे बनके सवाली-------3
भर दे तू झोली मेरी बिलकुल खाली,
दे अपनी निगाह की किरण शेरां वाली |
इधर कर निगाह-ए-करम शेरां वाली |

रहम कर रहम कर रहम शेरां वाली ...

नंगी-नंगी पैरी देवां चल के मैं आया----3
जित्थे-जित्थे तेरा मंदिर, शीश झुकाया,
तू काढ दे दिलां दी ए चुबन शेरां वाली |
इधर कर निगाह-ए-करम शेरां वाली |

रहम कर रहम कर रहम शेरां वाली ...


हर्ष महाजन

!! जय माता दी !!

Monday, May 18, 2015

काश तुम साथ होते तो यकीनन


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काश दिल में तेरे उल्फत के ज़खीरे होते,
तुम यकीनन मेरे....हाथों में लकीरें होते |
___________हर्ष महाजन

Saturday, May 16, 2015

तेरे क़दमों पे शमाओं को गिला है तुझसे

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तेरे क़दमों पे शमाओं को गिला है तुझसे,
ये खलल दिल में हुआ जो भी मिला है तुझसे |
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ये महफिलें तो हुईं सच में तुझी से रौशन,
जब से आने का पता तेरा चला है तुझसे |

मौज ये तेरी हुई दिल भी हुआ गाफिल सा,
आश्ना जब से हुई कोई मिला है तुझसे |

ये लफ्ज़ तुझपे चलेंगे कभी यूँ तंज बनके,
ज़बर से अपने भी कह देंगे गिला है तुझसे |

मौत दिल की या बदन की या मुकम्मिल है ये ,
ये महफ़िलों में ‘हर्ष’ कोई जला है तुझसे |

हर्ष महाजन

Friday, May 15, 2015

शिकवे गिले जो कुछ भी हैं, तुझको भी हैं मुझको भी हैं




OOOOOOOOO
 
शिकवे गिले जो कुछ भी हैं, तुझको भी हैं मुझको भी हैं ,
परेशानियां जो कुछ भी हैं......तुझको भीं मुझको भी हैं |
तुमको रहेगा उम्र-भर............इस टूटते रिश्ते का गम
मजबूरियां जो कुछ भी हैं....तुझको भी हैं मुझको भी हैं |

OOOOOOOOO

बेचकर क्या ज़मीर....इंसा रह पायेगा



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बेचकर क्या ज़मीर....इंसा रह पायेगा,
दौलतों का वज़न क्या वो सह पायेगा |
जिस अना पे टिकी थी कली शाख पर,
गर टूटी क्या शिकवों को सह पायेगा |

_______हर्ष महाजन

Thursday, May 14, 2015

मुझको मेरा यार पुराना पूछेगा

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बदली में है चाँद दीवाना पूछेगा,
मुझको मेरा यार पुराना पूछेगा |

शक्ल से मेरी नफरत उसको बेपनाह ,
खो गए तो ठोर ठिकाना पूछेगा |

इन्तहा यूँ ज़ुल्म की लगता हो गयी,
करके वो मुझको बेगाना पूछेगा |

जाग उठे नफरत न मेरे दिल में अब,
फिर वो मिलने का बहाना पूछेगा |

टूटी जो तस्वीर लिए था दिल में  'हर्ष'
कहाँ गयी सारा ज़माना पूछेगा |

हर्ष महाजन





अतीत के पन्नों से

मुझे फिर बदहवास न करना तुम ख्वाबों में आकर



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मुझे फिर बदहवास न करना तुम  ख्वाबों में आकर
,
बा-मुश्किल चिराग-ए-दिल अपना शांत किया है मैंने  |

________________________हर्ष महाजन

Wednesday, May 13, 2015

ज़लज़ले जो आ रहे अब.....बात कुछ तो ज़रूर है



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ज़लज़ले जो आ रहे अब.....बात कुछ तो ज़रूर है,
पाप पर्वत हो चलें जब........खुदा का ये दस्तूर हैं |
कौन जाने इस ज़मीं से, नाम किस का हट गया,
ज़हर उगलें अब हवाएं.......वो भी अब मजबूर हैं |
___________________हर्ष महाजन

:एक क्षणिका:

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:एक क्षणिका:
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जिस पल
उसने
आँचल से
मुझे उतार दिया |
यूँ लगा !!
भर हुंकार
खुदा ने
वापिस पुकार लिया !!

~~०~~

____हर्ष महाजन




अतीत के पन्नो से ..........

Tuesday, May 12, 2015

इन्सान की फितरत क्या कहिये, मुर्दों में खज़ाना ढूंढ लिया

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इन्सान की फितरत क्या कहिये, मुर्दों में खज़ाना ढूँढ लिया,
कहाँ बेचें जिस्म के अंगों को, उसका भी ठिकाना ढूँढ लिया |

छोड़ें न मरगट में वो कफ़न, करते न हर तन को वो दफ़न ,
इंसान की कीमत कुछ भी नहीं, अपनों ने निशाना ढूँढ लिया |

नौकर हो  चाहे व्यापारी, चाहे हो बाबू सरकारी,
दौलत के भूखे-नंगों ने,  उनका भी निशाना ढूँढ लिया |

किश्तों में जब लोग बिकने लगे, अपनों के संग वो दिखने लगे,
अहसास मरे यूँ अपनों के,  उनको फुसलाना ढूँढ लिया |

जब पल-पल यूँ ही मरने लगे , ऐसे मंज़र जब चलनें लगे,
तो उम्र घटी शैतानों की , जब 'हर्ष' दीवाना ढूँढ लिया |


हर्ष महाजन