Tuesday, January 15, 2013

तेरे हुस्न-ओ-रुआब में कशिश इतनी

_______एक गीत

तेरे हुस्न-ओ-रुआब में कशिश इतनी,
कि डर कर तुझसे मुहब्बत ही न की |

मेरा रोम-रोम तुझे चाहे बहुत
पर मिलने की कभी जहमत ही न की |

जब किया था करम तूने हम पर
थी तपिश बहुत हिम्मत ही न की |

ऐसी ग़ज़ल नहीं, जहां न ज़िक्र तेरा
मेरी कलम ने कभी जुर्रत ही न की |

_________हर्ष महाजन