Sunday, March 30, 2014

काश तू मेरी किस्मत की लकीरों के अंदर देखती

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काश तू मेरी किस्मत की लकीरों के अंदर देखती,
गर होता इश्क़ मुझसे तो तू मुझमें समंदर देखती।


ज़िन्दगी तो तन्हां है यूँ ही अकेली नदिया सी मेरी,
गर होता हौंसला तुझमें तो मुझमें सिकंदर देखती । 


मुक़द्दर में चेहरों के...... बहुत से हजूम तो थे मेरे,
कोई होता चेहरा तुझसा तो मुझमें कलंदर देखती । 


छोड़ दिया सब कुछ मैंने देखकर गैर हाज़िरी तेरी,
मुक़द्दर जो होता तेरा…तो मुझमें पैगम्बर देखती ।

किस तरह निभाऊंगा ये सुफिआना अंदाज़ बिन तेरे,
काश होता कोई वज़ूद तेरा तो मुझमें बवंडर देखती ।


_____________हर्ष महाजन