Thursday, May 15, 2014

मुद्दत से दबे पाँव 'पाँव' यूँ सफ़र करता रहा

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मुद्दत से दबे पांव 'हर्ष' यूँ सफ़र करता रहा,
थी मोहब्बत बे-पनाह कहने से डरता रहा ।

-------------हर्ष महाजन

... पत्थरों के शहर में हैं पत्थरों से लोग अब

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पत्थरों के शहर में...... हैं पत्थरों से लोग अब,
भूल गए रिश्ते सभी अब पत्थरों के शौक अब ।
दिल कभी थी मंजिलें, जो प्यार से महफूज़ थी,
आज रिश्तों की जगह हैं,  पत्थरों के सोग अब ।

----------–--हर्ष महाजन

Tuesday, May 13, 2014

बदली में है चाँद दीवाना पूछेगा

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बदली में है चाँद दीवाना पूछेगा,
मुझको मेरा यार पुराना पूछेगा |

शक्ल से मेरी नफरत उसको बेपनाह ,
खो गए तो ठोर ठिकाना पूछेगा |

इन्तहा यूँ ज़ुल्म की लगता हो गयी,
करके वो मुझको बेगाना पूछेगा |

जाग उठे नफरत न मेरे दिल में अब,
फिर वो मिलने का बहाना पूछेगा |

टूटी जो तस्वीर लिए था दिल में  'हर्ष'
कहाँ गयी सारा ज़माना पूछेगा |

_______हर्ष महाजन

Sunday, May 11, 2014

जब सवालों में नज़र आने लगी

------माँ फ़क़त माँ------


जब सवालों में नज़र आने लगी,
माँ खुद मुझ से बतियाने लगी ।

अनगिनित सिलवटें लिए चेहरे पे,
वक़्त पे खा लिया कर बताने लगी।

किस तरह झांका दिल के दरीचों में,
हर आने वाली तकलीफ समझाने लगी ।

कब तक चलेंगे रिश्ते दूर दूर रह कर,
फिर ले ले सबका नाम दोहराने लगी ।

नहीं होता इक सा वक़्त बताया उसने,
इक पीड़ा थी चेहरे पे जिसे छुपाने लगी ।

कितना दर्द होता है फ़क़त एक दिन में,
सदियाँ लग जायेंगी कह कराहने लगी ।

___________हर्ष महाजन

Saturday, May 10, 2014

उसको लफ्ज़ ए मुहब्बत सिखाता रहा


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उसको लफ्ज़ ए मुहब्बत सिखाता रहा,
नज़्म वो लिखती .....धुन मैं बनाता रहा ।

उसकी तहरीरें दिल को.....चुबती रहीं,
मिसरा दर मिसरा उसका रुलाता रहा ।

हम मुहब्बत में शायद.......नाकाम रहे,
फिर भी दिल मैं.....उसी पे लुटात़ा रहा ।

मैंने सदियों कही....गम पे ग़ज़लें बहुत,
पर मैं नज्में उसी की........सुनाता रहा ।

रूठ कर जब वो दिल से हुई बे-दखल ,
जाने अफ़साने....जग क्या बनाता रहा ।

उम्र भर मैकदा से.............रहा दूर दूर,
अब मैं बज्मों में पीता..... पिलाता रहा ।

--------------हर्ष महाजन

Wednesday, May 7, 2014

देखकर शख्स हमें मुस्कराते रहे


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देखकर शख्स....... हमें मुस्कराते रहे,
दूर तक हमको....... वो याद आते रहे ।

हम भी थे अजनबी, अजनबी वो भी थे,
तनहा-तनहा सफ़र......हम निभाते रहे।

दूर तक थी दिलों में.. खलिश सी बहुत,
जब सफ़र टूटा.........आँखें मिलाते रहे ।

क्यूँ ऐसे अनजान ज़ख्मों में....दर्द बहुत,
सोचकर उम्र भर.........सर खुजाते रहे ।

तरंगे-दिल से तो हम उनके...परेशान थे,
फिर वो अक्स भी उनके.....सताते रहे ।

हम मिलेंगे शायद छोड़ा जिस मोड़ पर,
सहरो शाम वहां..........दीप जलाते रहे ।

हमसफ़र हमको अपने......अज़ीज़ बहुत,
पर वो शख्स दिल में घर को बनाते रहे ।

हमने जब जब ज़हन से, था पटका उन्हें,
रख वो ख्वाबों में..... जुल्फें सजाते रहे ।

जान 'पर' इश्क अनजान रहे हमसफ़र,
सोच ये अब 'हर्ष'.... अश्क बहाते रहे ।

पर=गैर

---------------हर्ष महाजन

Tuesday, May 6, 2014

... मैं भी था अजनबी,अजनबी वो भी था,


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मैं भी था अजनबी, अजनबी वो भी था,
तनहा-तनहा सफ़र.......हम निभाते रहे।
दूर तक थी दिलों में.. .खलिश भी बहुत,
जब था टूटा सफ़र.... अश्क बहाते रहे।

---------------हर्ष महाजन

... जितने भी दे दे तू गम सब से गुज़र जाऊंगा,


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जितने भी देगी तू गम सब से गुज़र जाऊंगा,
गर ज़ख्म तुझको मिलेगा तो बिखर जाऊंगा ।
तू है माझी मैं मुसाफिर हूँ तेरी कश्ती का,
जब भी चाहेगी तू मुझसे मैं उतर जाऊंगा ।

--------–-हर्ष महाजन

किस तरह इक शख्स जो हमने उसे था मिला दिया


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 Kis tarah ik shaks jo hamne usey tha mila diya,
Ik umra ka rishta tha jo ab ajnabi sa bana diya.
Tazzub hua mujhko bhi ab wo yaar badle is tarah,
JyuN ho tawayaf shahar ki basti ko jung me dubaa diya

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किस तरह इक शख्स जो हमने उसे था मिला दिया,
इक उम्र का रिधता था जो अब अजनबी सा बना दिया ।
ताज्जुब हुआ मुझको भी अब वो यार बदले इस तरह.
ज्यूँ हो तवायफ शहर की बस्ती को जंग में दुबा दिया ।

---------------हर्ष महाजन

Monday, May 5, 2014

... कोई क्यूँ नहीं उठाता अब उँगली उस तरफ 'हर्ष',


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कोई क्यूँ नहीं उठाता अब उँगली उस तरफ 'हर्ष',
अस्मत जहां पल में अजनबी के हाथ बिक जाती है ।

------------हर्ष महाजन

Sunday, May 4, 2014

छोड़ मुझसे रिश्ता नए रिश्ते की खातिर


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Chhod mujhse rishta naye rishte ki khaatir,
Nikla wo dil se shaks tha dil ka bada shaatir.
Kuch aisi shaksiat liye wo dil ko chhoo gayaa,
Magar wo zind se aise gaya .....jaise musafir.
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छोड़ मुझसे रिश्ता,....... नए रिश्ते की खातिर,
निकला दिल से शख्स था दिल का बड़ा शातिर ।
कुछ ऐसी शक्सियत लिए ..वो दिल को छू गया,
मगर   वो  ज़िन्द  से ऐसे गया   जैसे मुसाफिर।


------------हर्ष महाजन

न हिन्दुओं का हूँ न मुसलमानों का कातिल

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न हिन्दुओं का हूँ न मुसलमानों का कातिल,
मैं ऐसा वक़्त हूँ कि...हूँ इंसानों का कातिल ।
अब ऐसे मुल्क में कहाँ.....कोई राज करेगा,
जो भी करेगा होगा...बे-ईमानों का कातिल ।


--------------हर्ष महाजन

Saturday, May 3, 2014

.तेरा दिल रकीबों का शहर है, मैं हैरान हूँ अब क्या करूँ


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तेरा दिल रकीबों का शहर है, मैं हैरान हूँ अब क्या करूँ,
इन काफिरों के शहर में अब, परेशान हूँ  अब क्या करूं ।
मेरा सब्र मुझ से बिछुड़ गया, तनहायी में है पड़ा हुआ,
अब कुछ ही पल का लगे मुझे, मेहमान हूँ अब क्या करूँ ।

-----------------हर्ष महाजन

Friday, May 2, 2014

राजनीति में आजकल अजीब सा उफान उबलने लगा है

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राजनीति में आजकल अजीब सा उफान उबलने लगा है,
लगता है अब समंदर में खौफनाक तूफ़ान उछलने लगा है ।

किस तरह निभायेंगे उठते हुए ज़लज़ले ये फरेबी लोग,
अप  ही अपने को कह कर बे-ईमान कुचलने लगा है ।


-------------हर्ष महाजन

नफरत से लबरेज़ तो था वो मगर हमदर्द निकला

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नफरत से लबरेज़ तो था वो मगर हमदर्द निकला,
इक पहलू खुदाबन्द उसका दूजा कमज़र्द निकला ।
भरी दुनियाँ में शोहरत से.…. बेहद परहेज़ था उसे,
झेल कर मगर खतरे, कातिलों का सरदर्द निकला ।


-------------हर्ष महाजन

क़ातिल कब तलक दुआओं पर जियेगा,




क़ातिल कब तलक दुआओं पर जियेगा,
फतवे की  मगर सजाओं पर जियेगा । 

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Qatil kab talak duaaoN par jeeyega,
Fatwe ki magar sajaoN par jeeyega.


-------------Harash Mahajan

Wednesday, April 30, 2014

गम से रहा गाफिल जो शख्स खुश है खबर आने लगी


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गम से रहा गाफिल जो शख्स खुश है खबर आने लगी,
है चोट चेहरे की सिलवटों में मगर नज़र आने लगी ।
कुछ दिन शहीदों की कब्र पर अब और जलेंगे दीप यहाँ,
क्या हुआ सियासती दौर को जो नस्ल इधर आने लगी ।

--------------हर्ष महाजन

Tuesday, April 22, 2014

क्या उदास नगमों का राज़ था टुकड़ों में दिल का साज़ था


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क्या उदास नगमों का राज़ था, टुकड़ों में दिल का साज़ था,
मैं हैरान हूँ इस बात पर मेरे दिल पे किस का राज़ था।
मैं हूँ झौंका इश्की बहार का, मुझे इल्म न था इज़हार का,
मेरे ज़ख्म ज़िसने हरे किये, मेरे दिल का वो हमराज़ था ।

----------------हर्ष महाजन

KishtoN meiN rishtoN ko tum nibhate ho kyuN


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KishtoN meiN rishtoN ko tum nibhate ho kyuN,
Dil ko karke yuN ghayal sataate ho kyuN.

Zindagi ne kyuN chaha wahi dil khuda,
Jis meiN bhar kar mohabbat hataate ho kyuN.

KaliaN khilti nahiN gar murjha jaayen to,
Be-wafa dost phir tum banate ho kyuN.

Khud hi jaalim kisi ko kaheN bhi toh kya,
Khud bana kar gharoNda phir dhaate ho kyuN.

YuN tadpnaa, tadap kar phir rona bhi kyuN
Gar mohabbat nahiN phir jataate ho KyuN.

-----–-----------Harash Mahajan