Friday, July 6, 2012

मेरे फन की खिड़की अब खुलने लगीं रे

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मेरे फन की खिड़की अब खुलने लगीं रे
चादर मैली ज़हन में अब धुलने लगी रे ।

जब से छोड़ा माँ ने चोला दिल न माने रे
बेटी घर में मिश्री सी अब घुलने लगी रे ।

गुजरी ऐसी बातें दिल को कैसे समझाएं
पापा की सब बातें इक-इक तुलने लगीं रे ।

ताश के पत्तों सा सब कुछ बिखर गया रे
इक-इक कर जब बातें सारी खुलने लगी रे ।

तेरे बिना ये ज़िन्द माँ अज़ाब लगे लेकिन
सूरत तेरी फलक पर अब खिलने लगी रे ।

_____________हर्ष महाजन ।