Wednesday, August 13, 2014

यूँ तो अश्कों को मेरी आँख से जाना होगा



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यूँ तो अश्कों को मेरी....आँख से जाना होगा,
इश्क गर कश्ती है समंदर में तो आना होगा |
जाने क्यूँ कहता है...पत्थर मुझे चाहने वाला,
मैं तो किस्मत ही कहूँ...उसको बताना होगा |
 

___________हर्ष महाजन

Tuesday, August 12, 2014

जब मिलें फुरसतें कुछ अपनी कहानी लिखना



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जब मिलें फुरसतें कुछ......अपनी कहानी लिखना,
होंगे अफ़साने नए................बातें पुरानी लिखना |
फिर किताबों में तेरा..........फूल छुपाने का हुनर,
जब भी लिखना उसे भर-भर के जवानी लिखना |

_______________हर्ष महाजन

Monday, August 11, 2014

ऎसी नागिन की तरह डसने को तैयार है वो

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ऎसी नागिन की तरह..डसने को तैयार है वो,
चाहे अब जो भी है बस मेरी गजब यार है वो |
मेरी राहों में कितने शूल....उसने छोड़े मगर,
कभी न पीठ पर दुश्मन सा....करे वार है वो |

__________________हर्ष महाजन

Sunday, August 10, 2014

दिल हुआ जाता है मजबूर तुझ से बात करे

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दिल हुआ जाता है मजबूर..........तुझ से बात करे,
बात बस इतनी कि तू..........खुद ये शुरूआत करे |

गुज़रे हैं बाद तिरे लोग.............बहुत दिल से मेरे ,
पर कोई तुझ सा नहीं............रह-गुज़र साथ करे |

जाने क्यूँ आँखों में हर पल........रहे रौशन-रौशन,
अब शिकायत है ये कुदरत से......क्यूँ वो रात करे |

अब तो लरजे है तसव्वुर में........बदन तेरा सनम,
और जज़्बात सारी रात...........अब सवालात करे |

दिन थे क्या शहर-ए-बदन तक की खबर रखते थे,
अब तो मुश्किल हुआ इतना......कि मुलाकात करें |
______________हर्ष महाजन

Friday, August 8, 2014

मैंने माना नहीं कमतर था मुकद्दर मेरा

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मैंने माना नहीं....कमतर था मुकद्दर मेरा ,
पर मेरी ग़ज़लों में....सबने ही जुदाई देखी |
अपने किरदार की....औकात जो देखी मैंने,
अक्स देखा था जो आईने में तबाही देखी |

________________हर्ष महाजन

Wednesday, August 6, 2014

जब भी लिखना अच्छा लिखना

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जब भी लिखना अच्छा लिखना,
बूढा लगे तब भी बच्चा लिखना |
दुआ सलाम सभी से कायम रहे,
दिल का हिसाब सच्चा लिखना |


_______हर्ष महाजन

Sunday, August 3, 2014

यूँ मोहब्बत तो मुझे.....दिल पे गुनाह लगता



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यूँ मोहब्बत तो मुझे दिल पे गुनाह लगता है,
कम्बखत दिल है ये...उसकी ही पनाह लगता है |
नाम लिख लो इक मोहब्बत के दीवानों में कहीं,
दिल तो ज़ख़्मी है मगर उसपे फनाह लगता है |

_____________हर्ष महाजन

मुझको हर मोड़ पर सदमा ही दिया है जालिम

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मुझको हर मोड़ पर सदमा ही दिया है जालिम,
तूने हर राह पर इम्तिहान ही लिया है जालिम |
दर्द-ए-शायरी में भुलाता ही रहा..तुझको मगर,
ज़ख्म कहने लगे....क्या तूने किया है जालिम |

_____________हर्ष महाजन

Saturday, August 2, 2014

ये मोहब्बतें भी अजीब हैं रूठे कोई टूटे को

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ये मोहब्बतें भी अजीब हैं रूठे कोई टूटे कोई,
गर हो न प्यार नसीब में गूंथे कोई लूटे कोई |

____________हर्ष महाजन

Friday, August 1, 2014

किस तरह तलाशा उसने मेरे दिल में आशियाँ

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किस तरह तलाशा उसने मेरे दिल में आशियाँ,
जहाँ सदियों से खुद...इक दरीचां ढूंढ रहा हूँ मैं |


____________________हर्ष महाजन

Wednesday, July 30, 2014

मेरी धड़कन को दुनिया मनाती रही

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मेरी धड़कन को दुनिया.....मनाती रही,
चुप थी बे-दर्दी........हम को रुलाती रही |

दिल था टूटा मगर......मैं न टूटा कभी ,
बे-वफ़ा थी जो नज़रें.........चुराती रही |

इक खलिश थी मुझे,उसको भी रंज था,
जाने फिर क्यूँ वो...मातम मनाती रही |

बात जो कुछ भी थी....बीच उसके मेरे,
बे-वफ़ा गैरों को क्यूँ.........बताती रही |

मैं तो मायूस था.....वो खफा थी मगर ,
मैं भुलाता रहा.......वो याद आती रही |

___________हर्ष महाजन

Tuesday, July 29, 2014

ज़िक्र खुद अपने गुनाहों पे किया करता हूँ

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ज़िक्र खुद अपने गुनाहों पे किया करता हूँ,
कुछ सवालात सजाओं पे किया करता हूँ |

गम के इस पार जो हस्ती बनायी थी कभी,
दर्द-ए-इज़हार खताओं पे किया करता हूँ |

आदत-ए-इश्क में ख़ाक-ए-जिगर देख लिया,
बे-जुबां शायरी अदाओं पे किया करता हूँ |

उसके इंतज़ार में अब इतनी सजा पायी है,
दिल्लगी आजकल हवाओं पे किया करता हूँ |

मेरी तन्हायी का दिल में खलल इतना हुआ,
अब तो हर ज़िक्र बे-वफाओं पे किया करता हूँ |

___________हर्ष महाजन

Tuesday, July 22, 2014

इखलास-ए-इश्क में क्या करें, आओ मिल के दुनिया ही छोड़ चलें



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इखलास-ए-इश्क में क्या करें, आओ मिल के दुनिया ही छोड़ चलें,
न हो पूरा फ़र्ज़ गर उम्मीद का, तो ख्याल-ए-दुनिया ही मोड़ चलें |
यूँ तो हर तरफ बे-रुखी सी है.............धोखा फरेब खामोशी भी है,
क्यूँ न बे-जुबां इन बुतों से हम, खुशी-गम का रिश्ता ही तोड़ चलें |  

________________________हर्ष महाजन

Friday, July 18, 2014

सदियों से बिछुड़ी रूहें हम, जाने आज ये क्यूँ उदास हैं

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सदियों से बिछुड़ी रूहें हम, जाने आज ये क्यूँ उदास हैं,
तन्हा सी ढलती उम्र में.......मिलने की अब क्यूँ आस है ।

सागर सा रिश्ता था कभी, नदिया सा फिर क्यूँ बंट गया,
कोई ज़ख्म भी था मिला नहीं......क्यूँ दर्द का अहसास है ।

मेरा हमसफ़र अब संग मेरे, जाने फिर भी क्यूँ परेशान हूँ ,
शायद है टुकड़ा दिल का इक, कोई अब भी उसके पास है ।

----------------------------------हर्ष महाजन

Thursday, July 17, 2014

मुझे गम नहीं बे-वफ़ा है तू

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मुझे गम नहीं बे-वफ़ा है तू,
मुझे गम है मेरी खता है तू ।
क्यूँ इल्म मुझसे दगा किया,
इस ज़िन्द का काल सफा है तू ।

-------------हर्ष महाजन

Thursday, July 10, 2014

अपने लिए जी लें तो क्या, अपने लिए मर लें तो क्या



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अपने लिए जी लें तो क्या, अपने लिए मर लें तो क्या,
लहरों से,रिश्ते ताक़ पर, उन पर ग़ज़ल पढ़ लें तो क्या |

न थकन कोई न खलिश कोई, महफ़िल-ए-मोहब्बत सज़ गयी,
दौर-ए-ग़ज़ल चलता रहा, ये शौक़ हम कर लें तो क्या |


ये ज़िंदगी है अजीब सी, है मौत उसकी हमसफ़र,
नोक-ए-कलम सी मुख़्तसर, अब दोस्ती सर लें तो क्या |

हम हैं तलाश-ए-यार में, कोई ज़मीं छोडी नहीं,
गर महज़बी हो क़ैद में, कोई
फ़ुसूँ कर लें तो क्या |

अब रास्ता लगे धूल सा, वो भी ज़बीं पे लिखी नहीं,
अब क्या खुदा से गिला करें, इस गम में अब मर लें तो क्या |

____________हर्ष महाजन







फ़ुसूँ = जादू
ज़बीं = पेशानी.