Thursday, December 26, 2013

कसूर था ज़मीर का, न मैं दर्द तक छुपा सका



कसूर था ज़मीर का, न मैं दर्द तक छुपा सका,
दगा दिया ज़मीर ने, न ज़मीर तक बचा सका ।

ये वलवालों की आग जो रूह तक निगल गयी,
हसरतों की आग न,  बता सका न बुझा सका ।

मैं ढूँढता रहा था उसके ……खौफ की इबारतें,
वो इस कदर ज़ुदा हुआ फिर दोस्त न बना सका ।

ये कैसा था अज़ाब..... मेरी ज़िंदगी बदल गया,
न दोस्त ही मैं बन सका न दोस्ती निभा सका ।

कुछ लोग बे-वफ़ा का मुझको रंजो गम दे गए,
मज़बूर था मैं कब्र में तोहमत न झुठला सका ।

_____________हर्ष महाजन