Thursday, May 21, 2015

कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए

नज़्म
कभी तो दिल की महफ़िल में सलाम-ए-इश्क फरमाइए,
हमें ईजाद करना है कलाम-ए-इश्क चले आइये |
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तुझे बस देखकर लफ्ज़ी तलाफुज़ भूल जाता हूँ ,
अहसासों की शहादत हो रही अब तो चले आइये |
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दर्द इतना है दिल में आज फिर भी मैं दुआ दूंगा,
यकीं मुझको है ढूँढोगे कलम इस बार चले आइये |
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अगर साँसों की कीमत पर गए कुछ लोग मिल जाएँ,
मिलेगा लुत्फ़ तभी जब लोग वो कह दें चले आइये |
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ये नफरत कितनी भी ऊंची सख्त-जाँ हो मगर फिर भी,
मुहब्बतों के सभी रस्ते दिलों से हैं चले आइये |



__________हर्ष महाजन