Saturday, August 18, 2012

आदमी को चाहिए ...अपने लिए दो गज ज़मीं

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आदमी को चाहिए ...अपने लिए दो गज ज़मीं,
जाने फिर क्यूँ चाहतों में, दो जहां की हर ज़मीं |
कौन जाने ज़िन्दगी का, ये दिया कब तक जले,
खुद ग़मों की बाढ़ में बहने लगे गी जब ज़मीं |
देख कर अब आईना, खुद से भरोसा उठ गया,
अब खुदा से मांगता है "हर्ष" अब दो गज ज़मीं
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_______________हर्ष महाजन |


Ek puraani kriti thodi edit ke saath