Wednesday, September 4, 2013

सोचा इक ग़ज़ल मैं उसके नाम कर दूँ



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सोचा इक ग़ज़ल मैं उसके नाम कर दूँ ,
दिल से गुनगुनाऊँ फिर मैं शाम कर दूँ |

पर हाथों की लकीरें कुछ बोलती नहीं,
खुद को सोचा इश्क में बदनाम कर दूँ |

मजहबी हलकों में इश्क खो रहा असर,
ग़ज़लें ऐसी कह दूँ क़त्ल-ए-आम कर दूं |

मुश्किल के दौर में है शब् नसीब की,
कह दो ये नसीबा मैं नीलाम कर दूँ |

यादें दिल में क़ैद अब क्या सजा मिले,
दोस्त कहो शहर में सर-ए-आम कर दूँ |

_____________हर्ष महाजन