Saturday, September 29, 2012

कभी जुल्फों पे कभी उनकी पेशानी पे नज़र

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कभी जुल्फों पे कभी उनकी पेशानी पे नज़र,
लब चले मेरे जहां उनकी निशानी पे नजर |

उनकी नजरों से लगा मुझको पहचाना ही नहीं
मैं परीशाँ हूँ मगर उनकी हैरानी पे नजर |

लब पे शिकवे हैं मगर कैसे निभाएं उनको,
भूले वो रस्मे-वफ़ा उनकी नदानी पे नजर |

कोई लम्हा भी खुशी का न नजर आया मुझे,
है तो अपने ही मगर गैर जवानी पे नजर |

बे-वफ़ा होके भी वो मेरी रगों में शामिल ,
मैं जुदा उनसे मगर उनकी कहानी पे नजर |


___________हर्ष महाजन |

मैं तो इक नन्नी सी जाँ देस तेरे आयी हूँ



प्यारी नन्ही सी "आन्या" के लिए एक प्यार भरी कविता
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आन्या अपनी माँ से मुखातिब --------
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मैं तो इक नन्नी सी जाँ देस तेरे आयी हूँ
मुझको तू सींच ले आँखों से तेरी जायी हूँ |

मुझको डर था कि खुदा देगा मुझे कैसी माँ,
तेरे आँचल में सिमट कर ही मैं मुस्कायी हूँ |

मैं हूँ छोटी सी मगर दुनिया के गम तू जाने
कुछ दिन तू ठहर ज़रा ऐसा हल मैं लायी हूँ |

टपकेंगी बूँदें तेरी आँख से पढ़ते ही इसे,
तेरे पास आने को पहले बहुत इतरायी हूँ |

तेरी दुनिया में रखा पहला कदम तो देखा,
ये तो अंगना-ए-बाबुल है फिर मैं परायी हूँ |

मुझको जो नाम दिया तूने तो जग 'आनू ' कहे
मुझको लगता है यहाँ सदियों से मैं छायी हूँ |

_______________हर्ष महाजन

Friday, September 28, 2012

जब वो मतलब से बात करते हैं

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जब वो मतलब से बात करते हैं,
देख आईने में फिर क्यूँ डरते हैं |

रात गुजरे है रोज़ तसव्वुर में ,
दिन भी उनके यूँ ही गुज़रते हैं |

दिल पे काबिज़ माहौल अंधेरों का
गम को पीते हैं और बिखरते हैं |

वक़्त अच्छा नहीं ये शक भी नहीं
अपने संग हैं वो पर कतरते हैं |

इश्के-हस्ती न हम संवार सके,
दिल में आंखों से रोज़ उतरते हैं |

__________हर्ष महाजन

Thursday, September 27, 2012

Tuesday, September 25, 2012

कभी अन्ना दिल में बसे बहुत कभी केजरीवाल क्या जान थी

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कभी अन्ना दिल में बसे बहुत कभी केजरीवाल क्या जान थी
अब कहाँ गए वो दबंग थे तब, करें बात आज़ाद हिंदुस्तान की |
बता कहाँ गयीं मुस्तेदियाँ , जो वो अपने रंग में ही छा गए,
वो हुनर अना के लिए बना, था फिकर जिन्हें बस कमान की |

______________________हर्ष महाजन

Monday, September 24, 2012

किताबों में पन्नों के निशाँ बोलते हैं

किताबों में पन्नों के निशाँ बोलते हैं,
कभी इस जगह उसकी यादें बसी थीं |

यूँ ही अश्क आँखों से झरे तो न होंगे,
कहीं यादें उसकी फिर तार-तार हुई थीं |

तसव्वर में उसने जब हँसते ही देखा
लगा हाथ में गम की लकीरें सजी थीं |

निगाहों में गम के कुछ बादल घिरे हैं
वज़ह कुछ तो होगी जो आँख में नमीं थी |

मौत की क्या जुर्रत जो उसे घेर लेती
मुकद्दर दीये का अब लौ की कमी थी |

_________हर्ष महाजन

Friday, September 21, 2012

क्या कहें शायरों की महफ़िल से ही नाता हो गया

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क्या कहें शायरों की महफ़िल से ही नाता हो गया
लफ्ज़ आते ही जुबां पर शायरी का ताँता हो गया |

उम्र बीती तन्हाई में बीच सब लोगों के साथ
जब चले अहसास कलम से दुनियाँ का काँटा हो गया |

जब लिखे किरदार उनके 'आस्तीन के सांप' जो थे
सारा जहां फिर हुआ मुखालिफ मेरा भी नाता हो गया |

तेरी बक्शी दुनियाँ में अब खुदगर्जी के सिवा है क्या
क्या लिखूं हर रुह है बेबस मेरे मगज़ का फाँका हो गया |

खुद्दारी और वफ़ा को जब से किताबों में लिखने लगा,
खुदगर्ज़ कहें फिर दुश्मनों से मेरा भी टाँका हो गया |

_____________________हर्ष महाजन

Wednesday, September 19, 2012

मुझे तोहमतों पे गिला नहीं, मुझे तीर-ओ-तंज न पसंद है

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मुझे तोहमतों पे गिला नहीं, मुझे तीर-ओ-तंज न पसंद है
मैं तो गैरों संग भी खुश हूँ पर अपनों का रंज न पसंद है |

मैदान-ए-इश्क़ में आज भी मेरी शायरी मशहूर है,
मैं तो खुद भी इश्की पीर हूँ मुझे प्रेम अपंग न पसंद है |

दुनियाँ में मैं बदनाम हूँ और सब खता मेरी आम हैं,
मैं उन दिलों मे भी धड़का हूँ मुझे जिनका रंग न पसंद है |

मैंने अपनी मज़िल पाने को सब रात-दिन भी नम किये,
खिदमत भी मैंने की बहुत पर खुदा से जंग न पसंद है |

खुद पे नजर रखता हूँ मैं बिखरा सा अब लगता हूँ मैं
करिदार पर मेरे जो करते तन्कीद बंद न पसंद है |

__________________हर्ष महाजन

मेरी कलम खुद बोलती, किस जिन्दगी को जिया हूँ मैं

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मेरी कलम खुद बोलती, किस जिन्दगी को जिया हूँ मैं,
तु बता ये कैसा इम्तिहाँ, खुद ही इक जलता दिया हूँ मैं |

मैं सुबह-ओ-शाम तेरे संग चला, तन्हाई में फिर गम चला,
इक नाव सी जो भंवर में हो, कुछ ऐसे पल ही जिया हूँ मैं |

मैं जिस्म तू मेरी जान है, मैं ग़ज़ल तू इक दीवान है,
पर घाव जो तूने दिए, हर घाव खुद ही सिया हूँ मैं |

ये तो लाज़िमी है इश्क़ में, कभी होती हैं मजबूरियाँ
जब घिर गए बादल कभी, खुद को मशाल किया हूँ मैं |

दुश्मन नहीं पर वहम है, न सिंहर उठें मेरी ख्वाहिशें
अपने ही ख़्वाबों में बगावत, तेरी दिल से पिया हूँ मैं |

___________________हर्ष महाजन

Tuesday, September 18, 2012

तेरे जन्म-दिन के उत्सव में अब क्या तुझे मैं उपहार दूं

गौरव महाजन ..जन्म-दिन की बहुत बहुत शुभ-कामनाएं
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तेरे जन्म-दिन के उत्सव में अब क्या तुझे
मैं उपहार दूं
दिल से निकले उन शब्दों को कहे तो सुर में मैं संवार दूं |

अद्भुत से रंगों मे अब चमकें अहसास जनम दिन के तेरे
कुछ तारे हैं जो फलक पे अटके कहे तो मैं सब उतार दूं |

कैसी अब ये खामोशी है और ये कैसी अब गुनगुनाहटें
है ये तरंगे संगीतों की तू कहे तो इस दिल को टंकार दूं |

कैसे बदलूँ जिल्द किताब की कैसे मैं दूं नया उपहार तुझे,
छूटे जो कोरे पन्ने किताब के उनपर जन्म-दिन संवार दूं |

पढ़-पढ़ कर तू अपने जीवन मे 'हर्षा' को उम्र-भर याद करे
ऐसा जन्म दिन तेरा है गाओ औ मैं भी ढेरों तुझे प्यार दूं |

जन्म -दिन मुबारक हो --जन्म-दिन मुबारक हो

___________हर्ष महाजन /नीलम महाजन

इतना हुआ था बे-कदर ज़ख्मों को पी गया

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इतना हुआ था बे-कदर ज़ख्मों को पी गया,
इक बे-वफ़ा सी ज़िंदगी अश्कों मे जी गया |

कुछ इस तरह है अब मेरी यादों का ये सफ़र
कुछ हो रहे हरे वो ज़ख्म कुछ खुद मैं सी गया |

वो इस तरह गया था मुझे गर्दिश में छोड़ कर
नज़रों से तो गया ही था वो जाँ से भी गया |

दुनियाँ मे जी रहा था वो इज्ज़त-ओ-शान से
फिर गर्दिशे-दौरा क्या चला नाम से ही गया |

वो बे-वफ़ा और बे-हया जो भी था यार मेरा,
जुबां पे शिकवे रंजो-अलम सब मैं पी गया |

_______________हर्ष महाजन

Monday, September 17, 2012

मेरी शहादत कबूल कर लो

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मेरी शहादत कबूल कर लो,

रुह पास है सब वसूल कर लो | 
नकाम-ए-इश्क़ में जाँ भी देंगे,
ये सब नसीहत असूल कर लो |

जब हो रहे हों ज़मीर के टुकड़े,

तो खुद को ही तुम रसूल कर लो |

खुद्दारी पे गर आंच भी आये

बे-खौफ खुद को मकतूल कर लो |

नामुमकिन हों हलाते वफ़ा जब

दुआएं अपनी मकबूल कर लो |

_________हर्ष महाजन


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मकतूल = murdered
रसूल = Messenger of god
मकबूल=मनचाही,
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Sunday, September 16, 2012

क्यूँ सतायेंगे मुझे जो हर बात सुनाते हैं


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क्यूँ सतायेंगे मुझे जो हर बात सुनाते  हैं
वो अपने हैं पर सब दुश्मन बताते हैं |

तलाश-ए-यार में बीत जायेगी उम्र यूँ

आस्तीन के सांप हर गाम पाए जाते हैं |

नफस-नफस उनके ग़मों से मुअत्तर है
इस कदर दिल पर नश्तर चुबा जाते हैं |

कब तक बचा के रखेंगे दोस्ती को यूँ ही
डर के बादल उन पर हमेशां मंडराते हैं |

ज़िंदगी का दस्तूर ही कुछ ऐसा है 'हर्ष'
दोस्ती के लिबास में दुश्मन आ जाते हैं |

_______________हर्ष महाजन |

मुअत्तर = भीगा हुआ |

कुछ तो है अपनों में कि कर रहे हैं इंतज़ार



कुछ  तो है अपनों में कि कर रहे हैं इंतज़ार,
मरने का या हैं मेरी मुहब्बत में गिरफ्तार |

उम्र भर बहाया पसीना उनको बनाने के लिए
खो चूका हूँ अस्तित्व अब खो चूका वो प्यार |

घुटनों के बल चलना सिखाया जिस आँगन में
उसी जगह लुटता हूँ औ खोता हूँ चैन-ओ-करार |

किस तरह सलामत रखूँ मैं अब अपना ईमान यहाँ,
सब धोखा है चऊँ ओर बस है रिश्तों का बाज़ार |

पास नहीं है किसी के कुछ भी सिर्फ गरूर ही गरूर
फूलों की सोहबत चाही, मगर मिले खार ही खार |

कब तक छिपाएंगे ये ऐब अपने खूनी जज्बों का
कब तक छुपेगा चेहरा कब चलेगी खुनी तलवार |

डर है तन्हाई का अब होश नहीं है मुझे ऐ 'हर्ष'
दोस्त हूँ सबका दिल में ढेरों प्यार के हैं अंबार |

____________________हर्ष महाजन |

Friday, September 14, 2012

मुझे अनजान मत समझो मेरी पहचान रहने दो

एक गीत हिन्दी दिवस पर........अप सभी साहित्यक कवियों के हवाले .......
हिंदी दिवस पर सभी को शुभ-कामनाएं...
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मुझे अनजान मत समझो मेरी पहचान रहने दो,
मैं हूँ आसान संग रक्खो ये इक एहसान रहने दो |
मैं बिंदी हूँ इस भारत की किताबों में तो रहने दो,
मैं हिन्दुस्तान की भाषा हूँ हिन्दुस्तान में रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ..................

मैं नत-मस्तक हूँ जयसिंह की इक पहचान दिया उसने
ये भाषा लाखों में चुन कर मुझे हिंद्दुस्तान दिया उसने |
मेरे माथे पे लगा बिंदी का इक अहसान रहने दो ,
करोड़ों हाथों में यूँ सौंप मेरा इनाम रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

मुझे छंदों में तुम बदलो मुझे दोहों में भी चख लो
मुझे ग़ज़लों से भी तोलो मुझे संगीत में रख लो |
मैं हूँ गागर में सागर अब मुझे नदिया सा बहने दो,
मुझे हक है मुझे भारत की सही पहचान रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

मुझे अंग्रेजो ने कमतर मुझे अपनों ने मारा है
उठी लाठी से फिर भी मैं देखा घुटनों तक गारा है |
मिले इंसान कुछ ऐसे इसे मात्रभाषा कहने दो
अब हिन्दुस्तान की जग में यही पहचान रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

यहाँ नेता हैं कुछ ऐसे हिंदी का विकास लायेंगे
हिंदी को अंग्रेज़ी में लिख कर हिंदी दिवस मनाएंगे |
उनके अंग्रेजी के भाषण कोई कहे उनको रहने दो
हिंदी को हिंदी दिवस पे तो सहित्यक मंच तक रहने दो |
मुझे अनजान मत समझो ................

____________________हर्ष महाजन

Thursday, September 13, 2012

ये दिल की दूरी भी अब मुझको रास आ न सकीं

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ये दिल की दूरी भी अब मुझको रास आ न सकीं
मगर वो पास रह के भी कभी मुस्करा न सकी |

मेरी आँखों ने दो-जहां का गम यूँ देखा है
मगर ग़मों पे मेरे कोई अश्क बहा न सकीं |

मेरी आखों के समंदर भी अश्कों से खारिज
मगर क्या गुजरी उनपे बूँद पलक पे आ न सकी |

मैं तो वो फूल हूँ खिज़ाओं में जो खिलता है
लगे वो क़ैद है गैरों में तभी आ न सकी |

मेरी आहों ने भी मुझसे है नाता तोड़ लिया
कोई तड़प भी मेरे दिल पे असर ला न सकी |

______________हर्ष महाजन

मेरे दिए हुए फूलों पे प्यार लिख लेना

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मेरे दिए हुए फूलों पे प्यार लिख लेना,
हुआ जो मुझसे दगा इंतज़ार लिख लेना |

कभी तू मूँद के आखों को दिल की सुन धड़कन
किसे वो देती सदा नाम यार लिख लेना |

ख्याले-यार से नशीला हो रहा है बदन
इंतिहा-ए-इश्क में मुझको बीमार लिख लेना |

तेरी नींदों में ख्वाब मेरे कभी चलने लगें
इन नेमतों का मुझे अस्ल हक़दार लिख लेना |

ग़मों को मैं भी आजकल सजा के रखने लगा
ज़रा सी ठेस पर मेरा दीदार लिख लेना |

_________________हर्ष महाजन |

Wednesday, September 12, 2012

अना वो रस्सी है इस जहां में, गर जल भी जाए, पर बल न जाए,

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अना वो रस्सी है इस जहां में, गर जल भी जाए, पर बल न जाए,
वफ़ा के बदले वफ़ा ही चाहे, पर इस वफ़ा में, भी छल न जाए |

मुमकिन नहीं उसे भूल पाऊं वो इश्क आफत-ए-जाँ अब बना है
नाज़-ओ-नखरे भी अब बहुत हैं पर कोई छलिया ही छल न जाए |

जब से यादों की मंजिलों पर अब उसने आना ही छोड़ दिया है
डर है कि उसकी ख्वाईश में अब महूरत जुदाई का टल न जाए |

ऐ गर्दिश-ए-दौरां क्या कहूँ मैं गली गली से शहर हुआ है
वफ़ा की अर्थी निकल चुकी है अब मेरी जाँ भी निकल न जाए |

फिराक-ए-यार ने अश्क दिए और हुस्न-ए-यारा ने दर्द दिया है
जो वक़्त गुज़रा है ख्वाब मानो जो अब बचा है फिसल न जाए |

___________________________हर्ष महाजन

Monday, September 10, 2012

उसकी नज़र से यूँ गिरा परेशान हो गया

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उसकी नज़र से यूँ गिरा परेशान हो गया
खामोशी से इक फासला दरम्यान हो गया |

दीया जो जल रहा था यहाँ बुझ रहा है आज
इक झोंका जो हवा का था तूफ़ान हो गया |

जुबां पे शिकवे रंज-ओ-अलम फलक को छू गए
दिल का खुदा था अब तलक,मेहमान हो गया |

जिसका था सर बुलंद यहाँ रिश्ते की नोक पर
तोहमत भी इस अंदाज़ से, बे-ईमान हो गया |

वफ़ा के रास्तों पे कभी थकते नहीं थे हम
इन कातिलों के शहर में अनजान हो गया |

टुकड़ों में जी रहा हूँ मगर अहसास जिंदा हैं,
उनको किया क़त्ल तो मैं इंसान हो गया |

अपनी खुददारी पे था मुझे नाज़ बहुत मगर ,
हालात यूँ बने कि 'हर्ष' कुर्बान हो गया |

________________हर्ष महाजन

Sunday, September 9, 2012

इंसान की ज़मीं ओ ये इंसा की डगर है




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इंसान की ज़मीं ओ ये इंसा की डगर है,
इंसानियत को छोड़ ये खामोश मगर है |

इस कदर कुछ यादें जो कुछ मेहरबाँ होंगी,
कुछ कहकशाँ थी यादों की जैसे वो शज़र है |

झुकेगा आसमां जो ज़िन्दगी का ज़मीं पर,
इंसान के बस में तो है पर लम्बा सफ़र है |

ये ज़िन्दगी की डोर हमेशां संग खुदा के है
उठेगा कारवाँ ये अपना किसको खबर है |

अब हो गया ये ज़ख्म-ए-जिगर फिर से हरा यूँ ,
ये दिल का गुलिस्तान अब 'हर्ष' का जिगर है |

_______________हर्ष महाजन

कहकशाँ=हवाओं कि तरंग