Friday, September 2, 2011

कारवाँ दर कारवां है जिंदगी

गज़ल
ख्वाब गर आंखों में हैं तो फिर जवां है जिंदगी
खिल सके न गुल तो पूछो तू कहाँ है जिंदगी
राम जाने क्यूँ किसी ने किस बिना पे कह दिया
हाद्साते कारवाँ दर कारवां है जिंदगी |

जिंदगी जिंदा दिली का नाम होता था कभी
आजकल क्यूँ आंसुओं की दास्ताँ है जिंदगी |

जिंदगी के रास्तों में फूल भी और ख़ार भी
जानकर भी हर वफ़ा की इम्तिहां है जिंदगी |
जब खुदा ने खींच दीं हैं कुछ लकीरें हाथ में
अब फकत इक दासता के दरमियाँ है ज़िंदगी |
 


__________हर्ष महाजन