Monday, September 5, 2011

____ग़ज़ल



दोस्तों से अनचाहे प्रश्न  करने लगा है
ये मंच मुझे अजनबी  लगने लगा है |

जुबां जो कभी चुप न थी अब खामोश है
ये सिलसिला दिल पत्थर करने लगा है |

ख्यालों में तस्वीर नज़र आती है उनकी
दिल  बे-सबब दीवारों पे चलने लगा है |

वादा किया, और निभाएगा ये कहा उसने 
क्या मालूम नयी चाल से छलने लगा है |

उनकी बातें जहरीले तीरों से कम न  थी
यूँ  लगा "हर्ष" जहन्नुम में पलने लगा है |

_________हर्ष महाजन