Sunday, September 25, 2011

माँ

दर्दो के सैलाब पलभर में चुन लेती है माँ
आह निकलने से पहले सुन लेती है माँ
सैलाब छुपा लेती है अपनी पलकों में वो
हम चाहे न चाहें खुद सपने बुन लेती है माँ |

_________हर्ष महाजन